Wednesday, June 27, 2018

वेद


वेद 

वेद का अर्थ है ज्ञान।
वेद शब्द विद सत्तायाम, विद ज्ञाने, विद विचारणे एवं विद् लाभे इन चार धातुओं से उत्पन्न होता है।
संक्षिप्त में इसका अर्थ है, जो त्रिकालबाधित सत्तासम्पन्न हो, परोक्ष ज्ञान का निधान हो, सर्वाधिक विचारो का भंडार हो और लोक परलोक के लाभों से परिपूर्ण हो। जो ग्रंथ इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के उपायों का ज्ञान कराता है, वह वेद है।
भारतीय मान्यता के अनुसार वेद ब्रह्मविद्या के ग्रंथभाग नही, स्वयं ब्रह्म हैं - शब्द ब्रह्म हैं।
प्राचीन काल से हमारे ऋषि-महर्षि, आचार्य तथा भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले विद्वानों ने वेद को सनातन, नित्य और अपौरूषेय माना हैं।
उनकी यह मान्यता रही है कि वेद का प्रादुर्भाव ईश्वरीय ज्ञान के रूप में हुआ है। इसका कारण यह भी है कि वेदों का कोई भी निरपेक्ष या प्रथम उच्चरयिता नहीं है।
सभी अध्यापक अपने पूर्व-पूर्व के अध्यापकों से ही वेद का अध्ययन या उच्चारण करते रहे हैं।
वेद का ईश्वरीय ज्ञान के रूप में ऋषि-महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से समाधि अवस्था में प्रत्यक्ष दर्शन किया। द्रष्टाओं का यह भी मत है कि वेद श्रेष्ठतम ज्ञान-पराचेतना के गर्भ में सदैव से स्थित रहते हैं।
परिष्कृत-चेतना-सम्पन्न ऋषियों के माध्यम से उनके समाधि अवस्था में प्रत्येक कल्प में श्रेष्ठतम ज्ञान-पराचेतना के गर्भ से प्रकट होते हैं।
कल्पान्त में पुनः वहीं समा जाते हैं।
वेद को श्रुति, छन्दस् मन्त्र आदि अनेक नामों से भी पुकारा जाता है।
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वेदों के चार हिस्से होते हैं

(१) संहिता ग्रन्थ

(२) ब्राह्मण ग्रन्थ

(३) आरण्यक ग्रन्थ

(४) उपनिषद् ग्रन्थ

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वेदों के छ: उपांग है । जिन्हे वेदांग भी कहा जाता है।

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द: ।

वेद के सम्यक अनुशीलन के निमित्त उपकारक शास्त्रों को वेदाड़्ग कहा जाता है।

महर्षि पाणिनि ने वेद पुरुष को षडड़्गो की कल्पना करते हुए कहा है कि साड़्गोपाड़्ग वेदाध्ययन के द्वारा ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति सम्भव है।

वेद के छः उपांग –

(१) छन्द (पाद-चरण),

(२) कल्प–हाथ,

(३) ज्योतिष्य –नेत्र,

(४) निरुक्त–कान,

(५) शिक्षा–घ्राण,

(६) व्याकरण–मुख है।  

इनके बिना वेद की पूर्ण स्थिति का ज्ञान असम्भव है।

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संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों का मन्त्र वाला खण्ड है। ये वैदिक वाङ्मय का पहला हिस्सा है जिसमें काव्य रूप में देवताओं की यज्ञ के लिये स्तुति की गयी है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। चार वेद होने की वजह से चार संहिताएँ हैं (हर संहिता की अपनी अलग अलग शाखा है):

भाषाविद और इतिहासकार ऋग्वेद संहिता को पूरे विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थों में से एक मानते हैं।
१-ऋग्वेद संहिता । जिसमें नियताक्षर/ विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना छन्द वाले मंत्रों की ऋचाएँ हैं,वह ऋग्वेद कहलाता है।

२-यजुर्वेद संहिता (शुक्ल और कृष्ण)। जिसमें अनितह्याक्षर वाले मंत्र हैं, वह यजुर्वेद कहलाता है।

३-सामवेद संहिता । जिसमें स्वरों सहित गाने में आने वाले मंत्र हैं, वह सामवेद कहलाता है।

४-अथर्ववेद संहिता ।जिसमें अस्त्र-शस्त्र, भवन निर्माण आदि लौकिक विद्याओं का वर्णन करने वाले मंत्र हैं, वह अथर्ववेद कहलाता है।

वेद मंत्रों के समूह को सूक्त या सुंदर कथन कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्य तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।

वेद की समस्त शिक्षाएँ सर्वभौम है।

वेद मानव मात्र को हिन्दू, सिख, मुसलमान, ईसाई बौद्ध,जैन आदि कुछ भी बनने के लिये नहीं कहतें।

वेद की स्पष्ट आज्ञा है- मनुर्भव = मनुष्य अर्थात् मननशील बन

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के मूल तत्व, गूढ़ रहस्य का वर्णन किया गया है।

सूक्त में आध्यात्मिक धरातल पर विश्व ब्रह्मांड की एकता की भावना स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुई है।

भारतीय संस्कृति में यह धारणा निश्चित है कि विश्व-ब्रह्मांड में एक ही सत्ता विद्यमान है, जिसका नाम रूप कुछ भी नहीं है ।

ऋक् संहिता में १० मंडल, बालखिल्य सहित १०२८ सूक्त हैं।

वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।

कात्यायन प्रभति ऋषियों की अनुक्रमणी के अनुसार ऋचाओं की संख्या १०५८०, शब्दों की संख्या १५३५२६ तथा शौनक कृत अनुक्रमणी के अनुसार ४, ३२, ००० अक्षर हैं।

ऋग्वेद की जिन २१ शाखाओं का वर्णन मिलता है, उनमें से चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार पाँच ही प्रमुख हैं-

१. शाकल,

२. वाष्कल,

३. आश्वलायन,

४. शांखायन और

५. माण्डूकायन ।

ऋग्वेद में ऋचाओं का बाहुल्य होने के कारण इसे ज्ञान का वेद कहा जाता है। ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक त्र्यम्बक-मंत्र या मृत्युञ्जय मन्त्र (७/५९/१२) वर्णित है, ऋग्विधान के अनुसार इस मंत्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है। विश्वविख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०) भी इसी में वर्णित है।

ऋग्वेद में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्त, तत्त्वज्ञान-सूक्त, संस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ०१०/१३७/१-७), श्री सूक्त या लक्ष्मी सुक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ० १०/१२९/१-७) तथा हिरण्यगर्भ-सूक्त (ऋ०१०/१२१/१-१०) और विवाह आदि के सूक्त (ऋ० १०/८५/१-४७) वर्णित हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है।



यजुर्वेदः- ऋग्वेद के लगभग ६६३ मंत्र यथावत् यजुर्वेद में हैं।

यजुर्वेद वेद का एक ऐसा प्रभाग है, जो आज भी जन-जीवन में अपना स्थान किसी न किसी रूप में बनाये हुऐ है।

संस्कारों एवं यज्ञीय कर्मकाण्डों के अधिकांश मन्त्र यजुर्वेद के ही हैं।

 यजुर्वेदाध्यायी परम्परा में दो सम्प्रदाय-

१. ब्रह्म सम्प्रदाय अथवा कृष्ण यजुर्वेद,

२. आदित्य सम्प्रदाय अथवा शुक्ल यजुर्वेद ही प्रमुख हैं।

वर्तमान में कृष्ण यजुर्वेद की शाखा में ४ संहिताएँ –

१. तैत्तिरीय,

२. मैत्रायणी,

३.कठ और

४.कपिष्ठल

कठ ही उपलब्ध हैं।

शुक्ल यजुर्वेद की शाखाओं में दो प्रधान संहिताएँ-

१. मध्यदिन संहिता और

२. काण्व संहिता ही वर्तमान में उपलब्ध हैं।

आजकल प्रायः उपलब्ध होने वाला यजुर्वेद मध्यदिन संहिता ही है।

इसमें ४० अध्याय, १९७५ कण्डिकाएँ (एक कण्डिका कई भागों में यागादि अनुष्ठान कर्मों में प्रयुक्त होनें से कई मन्त्रों वाली होती है।) तथा ३९८८ मन्त्र हैं। विश्वविख्यात गायत्री मंत्र (३६.३) तथा महामृत्युञ्जय मन्त्र (३.६०) इसमें भी है।



सामवेदः- सामवेद संहिता में जो १८७५ मन्त्र हैं, उनमें से १५०४ मन्त्र ऋग्वेद के ही हैं। सामवेद संहिता के दो भाग हैं, आर्चिक और गान। पुराणों में जो विवरण मिलता है उससे सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं के होने की जानकारी मिलती है। वर्तमान में प्रपंच ह्रदय,दिव्यावदान, चरणव्युह तथा जैमिनि गृहसूत्र को देखने पर १३ शाखाओं का पता चलता है। इन तेरह में से तीन आचार्यों की शाखाएँ मिलती हैं-

(१) कौमुथीय,

(२) राणायनीय और

(३) जैमिनीय।

सामवेद का महत्व इसी से पता चलता है कि गीता में कहा गया है कि -वेदानां सामवेदोऽस्मि। (गीता-अ० १०, श्लोक २२)। महाभारत में गीता के अतिरिक्त अनुशासन पर्व में भी सामवेद की महत्ता को दर्शाया गया है - सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रीयम्। (म०भा०,अ० १४ श्लोक ३२३)।

सामवेद में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक ऋषियों को एसे वैज्ञानिक सत्यों का ज्ञान था जिनकी जानकारी आधुनिक वैज्ञानिकों को सहस्त्राब्दियों बाद प्राप्त हो सकी है।

उदाहरणतः-

इन्द्र ने पृथ्वी को घुमाते हुए रखा है। (सामवेद,ऐन्द्र काण्ड,मंत्र १२१),

चन्द्र के मंडल में सूर्य की किरणे विलीन हो कर उसे प्रकाशित करती हैं। (सामवेद, ऐन्द्र काण्ड, मंत्र १४७)।

साम मन्त्र क्रमांक २७ का भाषार्थ है- यह अग्नि द्यूलोक से पृथ्वी तक संव्याप्त जीवों तक का पालन कर्ता है। यह जल को रूप एवं गति देने में समर्थ है।

अग्नि पुराण के अनुसार सामवेद के विभिन्न मंत्रों के विधिवत जप आदि से रोग व्याधियों से मुक्त हुआ जा सकता है एवं बचा जा सकता है, तथा कामनाओं की सिद्धि हो सकती है।

सामवेद ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी है।

ऋषियों ने विशिष्ट मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की।

अधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र,स्वर-चिकित्सा, राग नृत्य मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकले हैं।



अथर्ववेदः- अथर्ववेद संहिता के बारे में कहा गया है कि जिस राजा के रज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् शान्तिस्थापन के कर्म में निरत रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता हैः-

यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः।

निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम् ।। (अथर्व०-१/३२/३)।

भूगोल, खगोल, वनस्पति विद्या, असंख्य जड़ी-बूटियाँ,आयुर्वेद, गंभीर से गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा,अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धान्त, राजनीति के गुह्य तत्त्व, राष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमा, शल्यचिकित्सा, कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोगों का विवेचन, मृत्यु को दूर करने के उपाय, प्रजनन-विज्ञान अदि सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का निरूपण अथर्ववेद में है। आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व अत्यन्त सराहनीय है। अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा अभिचारिक दोनों तरह के अनुष्ठन वर्णित हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं। चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार अथर्व संहिता की नौ शाखाएँ- १.पैपल, २. दान्त, ३. प्रदान्त, ४. स्नात, ५.सौल, ६. ब्रह्मदाबल, ७. शौनक, ८. देवदर्शत और ९. चरणविद्य बतलाई गई हैं। वर्तमान में केवल दो- १.पिप्पलाद संहिता तथा २. शौनक संहिता ही उपलब्ध है। जिसमें से पिप्लाद संहिता ही उपलब्ध हो पाती है। वैदिकविद्वानों के अनुसार ७५९ सूक्त ही प्राप्त होते हैं। सामान्यतः अथर्ववेद में ६००० मन्त्र होने का मिलता है परन्तु किसी-किसी में ५९८७ या ५९७७ मन्त्र ही मिलते हैं।

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ब्राह्मणग्रन्थ हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों का गद्य में व्याख्या वाला खण्ड है। ब्राह्मणग्रन्थ वैदिक वाङ्मय का वरीयता के क्रममे दूसरा हिस्सा है जिसमें गद्य रूप में देवताओं की तथा यज्ञ की रहस्यमय व्याख्या की गयी है और मन्त्रों पर भाष्य भी दिया गया है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। हर वेद का एक या एक से अधिक ब्राह्मणग्रन्थ है (हर वेद की अपनी अलग-अलग शाखा है)।आज विभिन्न वेद सम्बद्ध ये ही ब्राह्मण उपलब्ध हैं :-

ऋग्वेद:

ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा)

कौषीतकि-(या शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)

सामवेद:

प्रौढ(या पंचविंश) ब्राह्मण

षडविंश ब्राह्मण

आर्षेय ब्राह्मण

मन्त्र (या छान्दिग्य) ब्राह्मण

जैमिनीय (या तावलकर) ब्राह्मण

यजुर्वेद :

शुक्ल यजुर्वेद:

शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा)

शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा)

कृष्णयजुर्वेद :

तैत्तिरीयब्राह्मण

मैत्रायणीब्राह्मण

कठब्राह्मण

कपिष्ठलब्राह्मण

अथर्ववेद:

गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

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आरण्यक हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च ग्रन्थ वेदों का गद्य वाला खण्ड है। ये वैदिक वाङ्मय का तीसरा हिस्सा है और वैदिक संहिताओं पर दिये भाष्य का दूसरा स्तर है। इनमें दर्शन और ज्ञान की बातें लिखी हुई हैं, कर्मकाण्ड के बारे में ये चुप हैं। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है।

वेद, मंत्र तथा ब्राह्मण का सम्मिलित अभिधान है। मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् (आपस्तंबसूत्र)।

ब्राह्मण के तीन भागों में आरण्यक अन्यतम भाग है।

सायण के अनुसार इस नामकरण का कारण यह है कि इन ग्रंथों का अध्ययन अरण्य (जंगल) में किया जाता था। आरण्यक का मुख्य विषय यज्ञभागों का अनुष्ठान न होकर तदंतर्गत अनुष्ठानों की आध्यात्मिक मीमांसा है। वस्तुत: यज्ञ का अनुष्ठान एक नितांत रहस्यपूर्ण प्रतीकात्मक व्यापार है और इस प्रतीक का पूरा विवरण आरण्यक ग्रंथो में दिया गया है।

प्राणविद्या की महिमा का भी प्रतिपादन इन ग्रंथों में विशेष रूप से किया गया है। संहिता के मंत्रों में इस विद्या का बीज अवश्य उपलब्ध होता है, परंतु आरण्यकों में इसी को पल्लवित किया गया है। तथ्य यह है कि उपनिषद् आरण्यक में संकेतित तथ्यों की विशद व्याख्या करती हैं। इस प्रकार संहिता से उपनिषदों के बीच की श्रृंखला इस साहित्य द्वारा पूर्ण की जाती है।

सम्प्रति केवल छह आरण्यक ही उपलब्ध होते हैं।

ऋग्वेद के दो आरण्यक हैं–ऐतरेय और शांखायन।

शुक्लयजुर्वेद से समबद्ध बृहदारण्यक है जो काण्व और माध्यन्दिन दोनों शाखाओं में प्राप्त है।

कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय और काठक शाखाओं का एक ही प्रतिनिधि ब्राह्मण है–तैत्तिरीयारण्यक।

मैत्रायणीयारण्यक नाम से मैत्रायणी–शाखा का आरण्यक पृथक् से उपलब्ध है।

सामवेद की कौथुमशाखा में छान्दोग्योपनिषद के अन्तर्गत आरण्यक भाग भी मिला हुआ है, किन्तु पृथक् से उसका आरण्यक–रूप में अध्ययन प्रचलित नहीं है। विषयवस्तु की दृष्टि से, प्राणविद्या का भी उसमें विशद वर्णन है।

तलवकार–आरण्यक (जैमिनिशाखीय) का कौथुमशाखीय संपादित संस्करण ही है छान्दोग्योपनिषद्।

अथर्ववेद का पृथक् से कोई आरण्यक यद्यपि प्राप्त नहीं होता, लेकिन उससे सम्बद्ध गोपथ–ब्राह्मण के पूर्वार्ध में बहुत–सी सामग्री ऐसी है जो आरण्यकों के अनुरूप ही है।

चारों वेदों के आरण्यकों के नाम हैं-

ऋग्वेद (ऐतरेय आरण्यक, शांखायन आरण्यक);

यजुर्वेद-

शुक्ल यजुर्वेद (शतपथ ब्राह्मण के माध्यंदिन शाखा का 14वां काण्ड एवं काण्वशाखा का 17वां काण्ड);

कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय आरण्यक);

सामवेद (तलवकार आरण्यक या जैमिनीयोपनिषद)।

अथर्ववेद का पृथक् से कोई आरण्यक प्राप्त नहीं होता है।

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उपनिषद् वैदिक वाङ्मय का चौथा और अंतिम हिस्सा है|  उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है - ‘समीप उपवेशन’ या 'समीप बैठना (ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)। यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से निष्पन्न हुआ है। सद् धातु के तीन अर्थ हैं: विवरण-नाश होना; गति-पाना या जानना तथा अवसादन-शिथिल होना। उपनिषद् में ऋषि और शिष्य के बीच बहुत सुन्दर और गूढ संवाद है जो पाठक को वेद के मर्म तक पहुंचाता है।

ब्रह्म माया वा परमेश्वर, अविद्या जीवात्मा और जगत् के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णनवाला भाग। जैसा की कृष्णयजुर्वेदमे मन्त्रखण्ड में ही ब्राह्मण है। शुक्लयजुर्वेदे मन्त्रभाग में ही ईसावास्योपनिषद है।

उपनिषद (रचनाकाल 1000 से 300 ई.पू. लगभग) कुल संख्या 108। भारत का सर्वोच्च मान्यता प्राप्त विभिन्न दर्शनों का संग्रह है। इसे वेदांत भी कहा जाता है। उपनिषद भारत के अनेक दार्शनिकों, जिन्हें ऋषि या मुनि कहा गया है, के अनेक वर्षों के गम्भीर चिंतन-मनन का परिणाम है। उपनिषदों को आधार मानकर और इनके दर्शन को अपनी भाषा में रूपांतरित कर विश्व के अनेक धर्मों और विचारधाराओं का जन्म हुआ। उपलब्ध उपनिषद-ग्रन्थों की संख्या में से ईशादि 10 उपनिषद सर्वमान्य हैं। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। आदि शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है, उनको प्रमाणिक माना गया है।

Thursday, May 17, 2018

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १

ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता अग्नि । छंद गायत्री।]

ॐ अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृत्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥१॥
Om - I praise Agni, the god of fire, (who is) the family priest, the divine priest/Pilot of the yajña or ritual of worship, (as well as the priest known as) Hotā, (and who) distributes great riches ||1||
हम अग्निदेव की स्तुती करते है (कैसे अग्निदेव?) जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म) के पुरोहित (Pilot आगे बढाने वाले), देवता (अनुदान देनेवाले), ऋत्विज (समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करनेवाले), होता (देवो का आवाहन करनेवाले) और याचको को रत्नों से (यज्ञ के लाभों से) विभूषित करने वाले है ॥१॥

अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒रृषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥२॥
जो अग्निदेव पूर्वकालिन ऋषियो (भृगु, अंगिरादि) द्वारा प्रशंसित है। जो आधुनिक काल मे भी ऋषि कल्प वेदज्ञ विद्वानो द्वारा स्तुत्य है, वे अग्निदेव इस यज्ञ मे देवो का आवाहन करे ॥२॥
The god of fire (is) worthy of being praised and solicited by (both) the former Seers and the present ones. Let him bring the gods here! ||2||

अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥३॥
(स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर) ये बढा़ने वाले अग्निदेव मनुष्यो (यजमानो) को प्रतिदिन विवर्धमान (बढ़ने वाला) धन, यश एवं पुत्र-पौत्रादि वीर् पुरूष प्रदान करनेवाले हैं ॥३॥
Through the god of fire, may (one) obtain possessions (and) prosperity day by day indeed! (Also, may one gain) beauty and glory (along with) the greatest wealth consisting of (heroic) sons! ||3||

अग्ने॒ यं य॒ज्ञम॑ध्व॒रं वि॒श्वत॑: परि॒भूरसि॑। स इद्दे॒वेषु॑ गच्छति॥४॥
हे अग्निदेव। आप सबका रक्षण करने मे समर्थ है। आप जिस अध्वर (हिंसारहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते है, वही यज्ञ देवताओं तक पहुंचता है ॥४॥
Oh god of fire, that (ritual of) worship (or) sacrifice you enclose or pervade from all sides, certainly goes to the gods ||4||

अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। दे॒वो दे॒वेभि॒रा ग॑मत्॥५॥
 हे अग्निदेव। आप हवि प्रदाता, ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक, सत्यरूप एवं विलक्षण रूप् युक्त है। आप देवो के साथ इस यज्ञ मे पधारें ॥५॥
(Let) Agni, the god (of fire), the real Hotā priest of wise intelligence, whose fame is most wonderful come here together with the gods 5||

यद॒ङ्ग द॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥६॥
हे अग्निदेव। आप यज्ञकरने वाले यजमान का धन, आवास, संतान एवं पशुओ की समृद्धि करके जो भी कल्याण करते है, वह भविष्य के किये जाने वाले यज्ञो के माध्यम से आपको ही प्राप्त होता है॥६॥
Oh god of fire, no doubt whatever prosperity and welfare you will (intend to) bestow --lit. "you will cause"-- upon the one who honors and serves the gods, oh Agirās, that (intention) of yours (comes) true indeed ||6||

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥७॥
हे जाज्वलयमान अग्निदेव । हम आपके सच्चे उपासक है। श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा आपकी स्तुति करते है और दिन् रात, आपका सतत गुणगान करते हैं। हे देव। हमे आपका सान्निध्य प्राप्त हो ॥७॥
Oh god of fire, illuminer of the dark, we come near you day by day, bringing salutation(s) by means of prayer and understanding! ||7||

राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं स्वे दमे॑॥८॥
हम गृहस्थ लोग दिप्तिमान, यज्ञो के रक्षक, सत्यवचनरूप व्रत को आलोकित करने वाले, यज्ञस्थल मे वृद्धि को प्राप्त करने वाले अग्निदेव के निकट स्तुतिपूर्वक आते हैं ॥८॥
(We come near you) who rule over the sacrifices who are the shining guardian of the divine law and settled order, (and who) grow and increase in your own house ||8||

स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥९॥
हे गाहर्पत्य अग्ने! जिस प्रकार पुत्र को पिता (बिना बाधा के) सहज की प्राप्त होता है, उसी प्रकार् आप भी (हम यजमानो के लिये) बाधारहित होकर सुखपूर्वक प्राप्त हों। आप हमारे कल्याण के लिये हमारे निकट रहे ॥९॥

Oh god of fire be easily accessible to us as a father to (his) son (and) accompany us so that (we can) obtain well-being and success! ||9||

Tuesday, February 6, 2018

होली पर किये जानें वाले टोटके


होली का पर्व उपाय की दृष्टि से अत्यधिक फल देने वाला होता है इस दिन किए गए टोटके शीघ्र फल देते हैं, अतः इस दिन उपाय करना श्रेयस्कर है....
नींव रखने से पहले आप जिस जगह अपना व्यापार शुरू करना चाहते हैं या भवन बनाना चाहते हैं वह स्थान आपको पूरी अनुकूलता दे इसके लिए आप होली के दिन वास्तु यंत्र को पीले रंग के वस्त्र पर स्थापित कर लें। उसका पहले धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित कर पूजन करें और निम्न मंत्र को 75 बार जप कर नींव में ही दबा दें। भवन हो या व्यापार स्थल, आपके अनुकूल बना रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी, भवन में रहने वाले सुखी रहेंगे। मंत्र- ऊँ नमो वैश्वानर वास्तु रुपाय, भूपति त्वं मे देहि दापय स्वाहा।
वास्तु दोष निवारण
अपने घर की सुरक्षा के लिए वास्तु यंत्र को ऊपर लिखे मंत्र का 51 बार जप कर आंगन में दबा दें। यह संभव न हो तो घर से बाहर जहां पौधे लगे हों, वहां दबा दें। ऐसा करने से हर प्रकार से आपका घर सुरक्षित रहेगा। इसमें श्रद्धा का होना आवश्यक है।
गृह क्लेश एवं दरिद्रता निवारण
घर के क्लेश, दुख, दरिद्रता आदि समाप्त हांे, इसके लिए शुद्ध वास्तु यंत्र लेकर केसर से सभी सदस्यों का नाम लिख लें और ऊपर दिए गए मंत्र का ग्यारह बार जप करें। यह उपाय होली से पहले पांच दिन तक करें। इसके पश्चात यंत्र को होली की अग्नि में डाल दें- क्लेश, दुख, दरिद्रता आदि का नाश हो जाएगा।
शत्रु पर विजय
मुकदमे में सफलता प्राप्त करने के लिए, शत्रु पक्ष को निर्बल करने के लिए एक कागज पर हल्दी से नीचे लिखा मंत्र लिख लें। फिर बगलामुखी का ध्यान करते हुए उसे उसी कागज में मौली से बांध दें। नीचे लिखे मंत्र का 41 बार जप करें। ऐसा पांच दिन तक करें और होली के दिन यंत्र को दुर्गा मंदिर में चढ़ा दें। मंत्र- ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्नां कीलय बुद्धिं नाशय ह्रीं ऊँ स्वाहा । नियम व श्रद्धा का होना आवश्यक है।
नजर दोष
भोजन को बुरी नजर से बचाने के लिए उसमें से प्रत्येक पदार्थ थोड़ा थोड़ा लेकर एक पत्ते पर रखें और उस पर गुलाल बिखेरें। बाद में उसे रास्ते में रख दें। बुरी नजर का प्रभाव जाएगा, फिर सभी सदस्य आराम से भोजन कर सकते हैं।
आर्थिक स्थिति में सुधार
यदि आर्थिक स्थिति खराब हो, तो शुक्रवार (शुक्ल पक्ष) को एकाक्षी नारियल पर सिंदूर, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ा कर लाल वस्त्र में बांधकर माता लक्ष्मी से प्रार्थना करें, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें व एकाक्षी नारियल को अपने व्यवसाय स्थल पर रखें। यदि होली के दिन यह उपाय कर लें, तो सोने पर सुहागा।
परीक्षा में सफलता
यदि परीक्षा में अंक अच्छे नहीं आते, बार बार असफलता मिलती हो तो गुरु-पुष्य योग का शुक्ल पक्ष के बुधवार को गणपति के मंदिर में सिंदूर का दान करें। यह निश्चित है कि श्रद्धा विश्वास के साथ ऐसा उपाय करने से परीक्षा में परिश्रम से अधिक सफलता प्राप्त होगी। जिन्हें यह समस्या है वह यह उपाय निर्देशानुसार अवश्य करें व लाभ उठाएं। परीक्षाएं आने वाली भी हैं। साथ साथ पढ़ाई करना तो आवश्यक है, भगवान उसमें सहायता करेंगे।
कर्ज मुक्ति
यदि आप लगातार कर्जों से परेशान हों या व्यवसाय में बाधा आ रही हो, या किसी भी प्रकार आय में वृद्धि नहीं हो पा रही हो तो एक सियार सिंगी होली के दिन एक चांदी की डिब्बी में रख लें व प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में सिंदूर चढ़ाते रहें। ऐसा करने से आप की उपर्युक्त सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी व शीघ्र ही फल की प्राप्ति होगी

सभी राशियों के लिए धन प्राप्ति का उपाय


मेष राशि
-रात में लाल चंदन और केसर घिसकर उससे रंग सफेद कपड़ा उससे रंगा हुआ सफेद कपड़ा यदि आप अपने गल्ले या तिजोरी में बिछाएंगे तो उससे आपकी समृद्धि में हमेशा वृद्धि होगी आकस्मिक धन हानि का अवसर भी नहीं आएगा और हमेशा घर में सुख शांति बनी रहेगी
-शाम के समय मुख्य द्वार पर घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं उस दीपक में २ काली गुंजा डाल दें तो वर्ष भर आपको आर्थिक रुप से परेशानी नहीं आएगी एवं आपने किसी को पैसा दिया हुआ है उधार दिया हुआ है तो पैसा भी जल्द ही मिलना चालू हो जाएगा
-मेष राशि के लिए लक्ष्मी प्राप्ति के लिए मंत्र- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-वृष राशि
वृषभ राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय- पैसा बहुत कमाने के बावजूद भी आप उसे बचत नहीं कर पा रहे हैं तो लक्ष्मी पूजन के साथ में कमल के फूल का भी पूजन करें तथा बाद में इस कमल के फूल को लाल कपड़े में बांधकर अपना धन रखने के स्थान पर या तिजोरी गले में रख दें लेकिन यह पूजा आपको दीपावली के दिन ही करनी है या किसी शुभ मुहूर्त में करनी है
-रात में गाय के घी के 2 दीपक जलाकर उन्हें किसी एकांत स्थान में अपनी जो भी मनोकामना जो भी इच्छा है बताते हुए वहां पर रखे हैं शीघ्र ही आपकी हर मनोकामना पूरी होनी शुरू हो जाएगी
- वृषभ राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र -स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं श्रीं
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मिथुन राशि
-मिथुन राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- यदि आप धन की कमी से जूझ रहे हैं लक्ष्मी गणेश पूजन करते समय आपको दक्षिणावर्ती शंख की पूजा करनी है पूजा करके उसे अपना धन रखने के स्थान पर रख दें धन प्राप्ति होनी शुरू हो जाएगी
-यदि आप कर्ज से बहुत ज्यादा परेशान हैं तो लक्ष्मी पूजन के बाद गणेश जी की प्रतिमा को हल्दी की माला पहनायें इससे आपकी परेशानी समाप्त होनी शुरू हो जाएगी एवं हरिद्रा गणपति की स्थापना करें उनकी सेवा पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिल जाती है
-मिथुन राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र कमलगट्टे स्फटिक की माला से -ॐ क्लीं श्रीं ऐं सः
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कर्क राशि
-कर्क राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- आपको धन लाभ की अभिलाषा है तो शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे तेल का पंचमुखी दीपक जलाएं इससे आपके धन प्राप्ति की अभिलाषा पूरी होनी शुरू हो जाएगी
-यदि आप त्रिकोण आकृति का झंडा भगवान विष्णु के मंदिर में ऊंचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएं कि वह हमेशा लहराता रहे तो जब तक वह लहराएगा आपका भाग्य चमक उठेगा
-कर्क राशि वालों के लिए धन प्राप्ति का मंत्र ॐ क्लीं ऐं श्रीं
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सिंह राशि
-सिंह राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय
- रात में घर के मुख्य दरवाजे पर गाय के घी का दीपक जला कर रखें, वह दीपक यदि सुबह तक जलता रहे तो समझे कि आप की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा ,साथ ही मान सम्मान में वृद्धि होगी मनोबल बढ़ेगा धन धन की वृद्धि होगी
-यदि आपको शत्रु परेशान कर रहे हैं तो दीपावली की शाम को या किसी भी अमावस्या की शाम को पीपल के पत्ते पर अनार की कलम से गोरोचन के द्वारा शत्रु का नाम लिखकर भूमि में दबा दें इससे आपके शत्रु परास्त होने शुरू हो जाएंगे
-सिंह राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ह्रीं श्री सौः
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कन्या राशि कन्या राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय आपको धन संबंधी कोई भी समस्या है तो आप लाल रुमाल में नारियल बांधकर अपने गल्ले तिजोरी में रखें धन लाभ होने लगेगा इसके साथ ही 2 कमलगट्टे की माला माता लक्ष्मी के मंदिर में दान अर्पित करें श्री आपको नौकरी संबंधित कोई समस्या है तो आप प्रतिदिन मीठे चावल को खिलाएं इससे आपकी नौकरी की समस्या का निदान होना शुरू हो जाएगा कन्या राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्रॐ श्रीं ऐं सों
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-तुला राशि
तुला राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय
यदि आपको व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो आप बड़ के पेड़ के पत्ते पर सिंदूर व देशी घी से ॐ श्रीं श्रियै नमः मंत्र लिखें और से बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें आपके व्यवसाय में घाटा बंद होना शुरू हो जाएगा
- लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए तुला राशि के लोग सुबह स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद किसी लक्ष्मी मंदिर में जाकर 11:नारियल अर्पित करें इससे आपके जीवन में लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलने लगेगी
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- वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय -वृश्चिक राशि के लोगों को यदि धन की इच्छा है तो वह अपने घर के बगीचे या बरामदे में केले के दो पेड़ लगाएं तथा इनकी देखभाल करें परंतु इनके फल का सेवन ना करें
-परिवार में अशांति है नागकेसर का फूल लाकर घर में कहीं भी छुपा दे जहां उसे कोई देख ना सके तो परिवार में अशांति का माहौल खत्म हो जाएगा
-वृश्चिक राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र । कमलगट्टे की माला से जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-धनु राशि
धनु राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय- इस राशि के लोग धन प्राप्ति के लिए पान के पत्ते पर रोली से श्रीं लिख कर अपने पूजा स्थान पर रखें तथा प्रतिदिन पूजा करनें से धन की प्राप्ति होना शुरू हो जाती है
-धनु राशि के लोग किसी बीमारी से परेशान हैं तो चंद्रमा को अर्घ दे बीमारी के निवारण के लिए प्रार्थना करें अमावस्या होने से चांद दिखाई नहीं देगा तो भी अर्घ दें इससे आपकी घर की आपके ऊपर की मानसिक परेशानी दूर होना शुरू हो जाती है
धनु राशि के लिए लक्ष्मी प्राप्ति का मंत्र -कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करेंॐ ह्रीं क्लीं सौः
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-मकर राशि
मकर राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय -काफी समय से यदि आपका धन कहीं रुका हुआ पड़ा है तो आप आकडे की रुई का दीपक अपने घर के ईशान कोण में अवश्य जलाएं इससे आपके रुके हुए धन की आवक शुरू हो जाएगी
-यदि विवाह में बाधा आ रही है तो भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पीला वस्त्र की मिठाई पीला फूल अर्पित करें
--मकर राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र है कमलगट्टे की माला से मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-कुंभ राशि
कुंभ राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- जीवन साथी के साथ नहीं बनती है तो खीर बनाएं उसका भोग मां लक्ष्मी को लगाएं और स्वयं भी खाएं साथ में अपने जीवनसाथी को भी खिलाएं इस से आपके दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी एवं घर में सुख शाति बनी रहेगी
-धन प्राप्ति के लिए नारियल के कठोर आवरण में घी डालकर लक्ष्मी जी के समक्ष दीपक जलाएं या दीपक रात भर जलने से आपके घर में धन की प्राप्ति शुरू हो जाएगी
--कुंभ राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र है कमलगट्टे की माला सेॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं
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-मीन राशि
मीन राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय -यदि आपको शत्रु पक्ष से परेशानी आ रही है तो आप सर्वप्रथम कर्पूर लेे देसी वाला मिट्टी की कटोरी में कपूर जलाएं और उस काजल से शत्रु का नाम जमीन में लिखें और अपने पैरों से पीट-पीटकर मिटा दें आपके ऊपर जो शत्रु पक्ष की परेशानी आ रही है वह धीरे-धीरे दूर होना शुरू हो जाएगी
-धन लाभ के लिए किसी भी लक्ष्मी मंदिर में जा कर कमल के फूलों की माला नारियल अर्पित करें तथा सफेद मिठाई का भोग लगाएं इससे आपके व्यापार में नौकरी में बरकत होगी एवं धन लाभ की संभावना बनेगी
-मीन राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र कमलगट्टे की माला से मंत्र का जाप करना हैॐ क्लीं सौः