Thursday, May 17, 2018

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १

ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता अग्नि । छंद गायत्री।]

ॐ अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृत्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥१॥
Om - I praise Agni, the god of fire, (who is) the family priest, the divine priest/Pilot of the yajña or ritual of worship, (as well as the priest known as) Hotā, (and who) distributes great riches ||1||
हम अग्निदेव की स्तुती करते है (कैसे अग्निदेव?) जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म) के पुरोहित (Pilot आगे बढाने वाले), देवता (अनुदान देनेवाले), ऋत्विज (समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करनेवाले), होता (देवो का आवाहन करनेवाले) और याचको को रत्नों से (यज्ञ के लाभों से) विभूषित करने वाले है ॥१॥

अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒रृषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥२॥
जो अग्निदेव पूर्वकालिन ऋषियो (भृगु, अंगिरादि) द्वारा प्रशंसित है। जो आधुनिक काल मे भी ऋषि कल्प वेदज्ञ विद्वानो द्वारा स्तुत्य है, वे अग्निदेव इस यज्ञ मे देवो का आवाहन करे ॥२॥
The god of fire (is) worthy of being praised and solicited by (both) the former Seers and the present ones. Let him bring the gods here! ||2||

अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥३॥
(स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर) ये बढा़ने वाले अग्निदेव मनुष्यो (यजमानो) को प्रतिदिन विवर्धमान (बढ़ने वाला) धन, यश एवं पुत्र-पौत्रादि वीर् पुरूष प्रदान करनेवाले हैं ॥३॥
Through the god of fire, may (one) obtain possessions (and) prosperity day by day indeed! (Also, may one gain) beauty and glory (along with) the greatest wealth consisting of (heroic) sons! ||3||

अग्ने॒ यं य॒ज्ञम॑ध्व॒रं वि॒श्वत॑: परि॒भूरसि॑। स इद्दे॒वेषु॑ गच्छति॥४॥
हे अग्निदेव। आप सबका रक्षण करने मे समर्थ है। आप जिस अध्वर (हिंसारहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते है, वही यज्ञ देवताओं तक पहुंचता है ॥४॥
Oh god of fire, that (ritual of) worship (or) sacrifice you enclose or pervade from all sides, certainly goes to the gods ||4||

अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। दे॒वो दे॒वेभि॒रा ग॑मत्॥५॥
 हे अग्निदेव। आप हवि प्रदाता, ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक, सत्यरूप एवं विलक्षण रूप् युक्त है। आप देवो के साथ इस यज्ञ मे पधारें ॥५॥
(Let) Agni, the god (of fire), the real Hotā priest of wise intelligence, whose fame is most wonderful come here together with the gods 5||

यद॒ङ्ग द॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥६॥
हे अग्निदेव। आप यज्ञकरने वाले यजमान का धन, आवास, संतान एवं पशुओ की समृद्धि करके जो भी कल्याण करते है, वह भविष्य के किये जाने वाले यज्ञो के माध्यम से आपको ही प्राप्त होता है॥६॥
Oh god of fire, no doubt whatever prosperity and welfare you will (intend to) bestow --lit. "you will cause"-- upon the one who honors and serves the gods, oh Agirās, that (intention) of yours (comes) true indeed ||6||

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥७॥
हे जाज्वलयमान अग्निदेव । हम आपके सच्चे उपासक है। श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा आपकी स्तुति करते है और दिन् रात, आपका सतत गुणगान करते हैं। हे देव। हमे आपका सान्निध्य प्राप्त हो ॥७॥
Oh god of fire, illuminer of the dark, we come near you day by day, bringing salutation(s) by means of prayer and understanding! ||7||

राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं स्वे दमे॑॥८॥
हम गृहस्थ लोग दिप्तिमान, यज्ञो के रक्षक, सत्यवचनरूप व्रत को आलोकित करने वाले, यज्ञस्थल मे वृद्धि को प्राप्त करने वाले अग्निदेव के निकट स्तुतिपूर्वक आते हैं ॥८॥
(We come near you) who rule over the sacrifices who are the shining guardian of the divine law and settled order, (and who) grow and increase in your own house ||8||

स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥९॥
हे गाहर्पत्य अग्ने! जिस प्रकार पुत्र को पिता (बिना बाधा के) सहज की प्राप्त होता है, उसी प्रकार् आप भी (हम यजमानो के लिये) बाधारहित होकर सुखपूर्वक प्राप्त हों। आप हमारे कल्याण के लिये हमारे निकट रहे ॥९॥

Oh god of fire be easily accessible to us as a father to (his) son (and) accompany us so that (we can) obtain well-being and success! ||9||

Tuesday, February 6, 2018

होली पर किये जानें वाले टोटके


होली का पर्व उपाय की दृष्टि से अत्यधिक फल देने वाला होता है इस दिन किए गए टोटके शीघ्र फल देते हैं, अतः इस दिन उपाय करना श्रेयस्कर है....
नींव रखने से पहले आप जिस जगह अपना व्यापार शुरू करना चाहते हैं या भवन बनाना चाहते हैं वह स्थान आपको पूरी अनुकूलता दे इसके लिए आप होली के दिन वास्तु यंत्र को पीले रंग के वस्त्र पर स्थापित कर लें। उसका पहले धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित कर पूजन करें और निम्न मंत्र को 75 बार जप कर नींव में ही दबा दें। भवन हो या व्यापार स्थल, आपके अनुकूल बना रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी, भवन में रहने वाले सुखी रहेंगे। मंत्र- ऊँ नमो वैश्वानर वास्तु रुपाय, भूपति त्वं मे देहि दापय स्वाहा।
वास्तु दोष निवारण
अपने घर की सुरक्षा के लिए वास्तु यंत्र को ऊपर लिखे मंत्र का 51 बार जप कर आंगन में दबा दें। यह संभव न हो तो घर से बाहर जहां पौधे लगे हों, वहां दबा दें। ऐसा करने से हर प्रकार से आपका घर सुरक्षित रहेगा। इसमें श्रद्धा का होना आवश्यक है।
गृह क्लेश एवं दरिद्रता निवारण
घर के क्लेश, दुख, दरिद्रता आदि समाप्त हांे, इसके लिए शुद्ध वास्तु यंत्र लेकर केसर से सभी सदस्यों का नाम लिख लें और ऊपर दिए गए मंत्र का ग्यारह बार जप करें। यह उपाय होली से पहले पांच दिन तक करें। इसके पश्चात यंत्र को होली की अग्नि में डाल दें- क्लेश, दुख, दरिद्रता आदि का नाश हो जाएगा।
शत्रु पर विजय
मुकदमे में सफलता प्राप्त करने के लिए, शत्रु पक्ष को निर्बल करने के लिए एक कागज पर हल्दी से नीचे लिखा मंत्र लिख लें। फिर बगलामुखी का ध्यान करते हुए उसे उसी कागज में मौली से बांध दें। नीचे लिखे मंत्र का 41 बार जप करें। ऐसा पांच दिन तक करें और होली के दिन यंत्र को दुर्गा मंदिर में चढ़ा दें। मंत्र- ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्नां कीलय बुद्धिं नाशय ह्रीं ऊँ स्वाहा । नियम व श्रद्धा का होना आवश्यक है।
नजर दोष
भोजन को बुरी नजर से बचाने के लिए उसमें से प्रत्येक पदार्थ थोड़ा थोड़ा लेकर एक पत्ते पर रखें और उस पर गुलाल बिखेरें। बाद में उसे रास्ते में रख दें। बुरी नजर का प्रभाव जाएगा, फिर सभी सदस्य आराम से भोजन कर सकते हैं।
आर्थिक स्थिति में सुधार
यदि आर्थिक स्थिति खराब हो, तो शुक्रवार (शुक्ल पक्ष) को एकाक्षी नारियल पर सिंदूर, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ा कर लाल वस्त्र में बांधकर माता लक्ष्मी से प्रार्थना करें, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें व एकाक्षी नारियल को अपने व्यवसाय स्थल पर रखें। यदि होली के दिन यह उपाय कर लें, तो सोने पर सुहागा।
परीक्षा में सफलता
यदि परीक्षा में अंक अच्छे नहीं आते, बार बार असफलता मिलती हो तो गुरु-पुष्य योग का शुक्ल पक्ष के बुधवार को गणपति के मंदिर में सिंदूर का दान करें। यह निश्चित है कि श्रद्धा विश्वास के साथ ऐसा उपाय करने से परीक्षा में परिश्रम से अधिक सफलता प्राप्त होगी। जिन्हें यह समस्या है वह यह उपाय निर्देशानुसार अवश्य करें व लाभ उठाएं। परीक्षाएं आने वाली भी हैं। साथ साथ पढ़ाई करना तो आवश्यक है, भगवान उसमें सहायता करेंगे।
कर्ज मुक्ति
यदि आप लगातार कर्जों से परेशान हों या व्यवसाय में बाधा आ रही हो, या किसी भी प्रकार आय में वृद्धि नहीं हो पा रही हो तो एक सियार सिंगी होली के दिन एक चांदी की डिब्बी में रख लें व प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में सिंदूर चढ़ाते रहें। ऐसा करने से आप की उपर्युक्त सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी व शीघ्र ही फल की प्राप्ति होगी

सभी राशियों के लिए धन प्राप्ति का उपाय


मेष राशि
-रात में लाल चंदन और केसर घिसकर उससे रंग सफेद कपड़ा उससे रंगा हुआ सफेद कपड़ा यदि आप अपने गल्ले या तिजोरी में बिछाएंगे तो उससे आपकी समृद्धि में हमेशा वृद्धि होगी आकस्मिक धन हानि का अवसर भी नहीं आएगा और हमेशा घर में सुख शांति बनी रहेगी
-शाम के समय मुख्य द्वार पर घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं उस दीपक में २ काली गुंजा डाल दें तो वर्ष भर आपको आर्थिक रुप से परेशानी नहीं आएगी एवं आपने किसी को पैसा दिया हुआ है उधार दिया हुआ है तो पैसा भी जल्द ही मिलना चालू हो जाएगा
-मेष राशि के लिए लक्ष्मी प्राप्ति के लिए मंत्र- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-वृष राशि
वृषभ राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय- पैसा बहुत कमाने के बावजूद भी आप उसे बचत नहीं कर पा रहे हैं तो लक्ष्मी पूजन के साथ में कमल के फूल का भी पूजन करें तथा बाद में इस कमल के फूल को लाल कपड़े में बांधकर अपना धन रखने के स्थान पर या तिजोरी गले में रख दें लेकिन यह पूजा आपको दीपावली के दिन ही करनी है या किसी शुभ मुहूर्त में करनी है
-रात में गाय के घी के 2 दीपक जलाकर उन्हें किसी एकांत स्थान में अपनी जो भी मनोकामना जो भी इच्छा है बताते हुए वहां पर रखे हैं शीघ्र ही आपकी हर मनोकामना पूरी होनी शुरू हो जाएगी
- वृषभ राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र -स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं श्रीं
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मिथुन राशि
-मिथुन राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- यदि आप धन की कमी से जूझ रहे हैं लक्ष्मी गणेश पूजन करते समय आपको दक्षिणावर्ती शंख की पूजा करनी है पूजा करके उसे अपना धन रखने के स्थान पर रख दें धन प्राप्ति होनी शुरू हो जाएगी
-यदि आप कर्ज से बहुत ज्यादा परेशान हैं तो लक्ष्मी पूजन के बाद गणेश जी की प्रतिमा को हल्दी की माला पहनायें इससे आपकी परेशानी समाप्त होनी शुरू हो जाएगी एवं हरिद्रा गणपति की स्थापना करें उनकी सेवा पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिल जाती है
-मिथुन राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र कमलगट्टे स्फटिक की माला से -ॐ क्लीं श्रीं ऐं सः
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कर्क राशि
-कर्क राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- आपको धन लाभ की अभिलाषा है तो शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे तेल का पंचमुखी दीपक जलाएं इससे आपके धन प्राप्ति की अभिलाषा पूरी होनी शुरू हो जाएगी
-यदि आप त्रिकोण आकृति का झंडा भगवान विष्णु के मंदिर में ऊंचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएं कि वह हमेशा लहराता रहे तो जब तक वह लहराएगा आपका भाग्य चमक उठेगा
-कर्क राशि वालों के लिए धन प्राप्ति का मंत्र ॐ क्लीं ऐं श्रीं
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सिंह राशि
-सिंह राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय
- रात में घर के मुख्य दरवाजे पर गाय के घी का दीपक जला कर रखें, वह दीपक यदि सुबह तक जलता रहे तो समझे कि आप की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा ,साथ ही मान सम्मान में वृद्धि होगी मनोबल बढ़ेगा धन धन की वृद्धि होगी
-यदि आपको शत्रु परेशान कर रहे हैं तो दीपावली की शाम को या किसी भी अमावस्या की शाम को पीपल के पत्ते पर अनार की कलम से गोरोचन के द्वारा शत्रु का नाम लिखकर भूमि में दबा दें इससे आपके शत्रु परास्त होने शुरू हो जाएंगे
-सिंह राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें ॐ ह्रीं श्री सौः
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कन्या राशि कन्या राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय आपको धन संबंधी कोई भी समस्या है तो आप लाल रुमाल में नारियल बांधकर अपने गल्ले तिजोरी में रखें धन लाभ होने लगेगा इसके साथ ही 2 कमलगट्टे की माला माता लक्ष्मी के मंदिर में दान अर्पित करें श्री आपको नौकरी संबंधित कोई समस्या है तो आप प्रतिदिन मीठे चावल को खिलाएं इससे आपकी नौकरी की समस्या का निदान होना शुरू हो जाएगा कन्या राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्रॐ श्रीं ऐं सों
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-तुला राशि
तुला राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय
यदि आपको व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो आप बड़ के पेड़ के पत्ते पर सिंदूर व देशी घी से ॐ श्रीं श्रियै नमः मंत्र लिखें और से बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें आपके व्यवसाय में घाटा बंद होना शुरू हो जाएगा
- लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए तुला राशि के लोग सुबह स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद किसी लक्ष्मी मंदिर में जाकर 11:नारियल अर्पित करें इससे आपके जीवन में लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलने लगेगी
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- वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय -वृश्चिक राशि के लोगों को यदि धन की इच्छा है तो वह अपने घर के बगीचे या बरामदे में केले के दो पेड़ लगाएं तथा इनकी देखभाल करें परंतु इनके फल का सेवन ना करें
-परिवार में अशांति है नागकेसर का फूल लाकर घर में कहीं भी छुपा दे जहां उसे कोई देख ना सके तो परिवार में अशांति का माहौल खत्म हो जाएगा
-वृश्चिक राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र । कमलगट्टे की माला से जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-धनु राशि
धनु राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय- इस राशि के लोग धन प्राप्ति के लिए पान के पत्ते पर रोली से श्रीं लिख कर अपने पूजा स्थान पर रखें तथा प्रतिदिन पूजा करनें से धन की प्राप्ति होना शुरू हो जाती है
-धनु राशि के लोग किसी बीमारी से परेशान हैं तो चंद्रमा को अर्घ दे बीमारी के निवारण के लिए प्रार्थना करें अमावस्या होने से चांद दिखाई नहीं देगा तो भी अर्घ दें इससे आपकी घर की आपके ऊपर की मानसिक परेशानी दूर होना शुरू हो जाती है
धनु राशि के लिए लक्ष्मी प्राप्ति का मंत्र -कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करेंॐ ह्रीं क्लीं सौः
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-मकर राशि
मकर राशि के लिए धन प्राप्ति के उपाय -काफी समय से यदि आपका धन कहीं रुका हुआ पड़ा है तो आप आकडे की रुई का दीपक अपने घर के ईशान कोण में अवश्य जलाएं इससे आपके रुके हुए धन की आवक शुरू हो जाएगी
-यदि विवाह में बाधा आ रही है तो भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पीला वस्त्र की मिठाई पीला फूल अर्पित करें
--मकर राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र है कमलगट्टे की माला से मंत्र का जप करें ॐ ऐं क्लीं सौः
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-कुंभ राशि
कुंभ राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय- जीवन साथी के साथ नहीं बनती है तो खीर बनाएं उसका भोग मां लक्ष्मी को लगाएं और स्वयं भी खाएं साथ में अपने जीवनसाथी को भी खिलाएं इस से आपके दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी एवं घर में सुख शाति बनी रहेगी
-धन प्राप्ति के लिए नारियल के कठोर आवरण में घी डालकर लक्ष्मी जी के समक्ष दीपक जलाएं या दीपक रात भर जलने से आपके घर में धन की प्राप्ति शुरू हो जाएगी
--कुंभ राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र है कमलगट्टे की माला सेॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं
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-मीन राशि
मीन राशि के लिए धन प्राप्ति का उपाय -यदि आपको शत्रु पक्ष से परेशानी आ रही है तो आप सर्वप्रथम कर्पूर लेे देसी वाला मिट्टी की कटोरी में कपूर जलाएं और उस काजल से शत्रु का नाम जमीन में लिखें और अपने पैरों से पीट-पीटकर मिटा दें आपके ऊपर जो शत्रु पक्ष की परेशानी आ रही है वह धीरे-धीरे दूर होना शुरू हो जाएगी
-धन लाभ के लिए किसी भी लक्ष्मी मंदिर में जा कर कमल के फूलों की माला नारियल अर्पित करें तथा सफेद मिठाई का भोग लगाएं इससे आपके व्यापार में नौकरी में बरकत होगी एवं धन लाभ की संभावना बनेगी
-मीन राशि के लिए धन प्राप्ति का मंत्र कमलगट्टे की माला से मंत्र का जाप करना हैॐ क्लीं सौः

Thursday, January 18, 2018

॥ नवग्रह जपमन्त्राः ॥


  सूर्यः
अथ सूर्यमन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीसूर्यमहामन्त्रस्य हिरण्यस्तूप ऋषिः
तृष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता घृणिरिति बीजम्
सूर्य इति शक्तिः आदित्य इति कीलकम्
सूर्यग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
सूर्याय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
तेजोमूर्तये तर्जनीभ्यां स्वाहा
वरदाय मध्यमाभ्यां वषट्
हंसाय अनामिकाभ्यां हुम्
शान्ताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्
कर्मसाक्षिणे करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्
सूर्याय हृदयाय नमः
तेजोमूर्तये शिरसे स्वाहा
वरदाय शिखायै वषट्
हंसाय कवचाय हुम्
शान्ताय नेत्रत्रयाय वौषट्
कर्मसाक्षिणे अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
धृतपद्मद्वयं भानुं तेजोमण्डलमध्यगम्
सर्वाधिव्याधिशमनं छायाश्लिष्टतनुं भजे १॥
पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः पद्मद्युतिः सप्ततुरङ्गवाहः
दिवाकरो लोकगुरुः किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देवः २॥
द्विभुजं पद्महारं वरदं मकुटान्वितम्
ध्यायेद्दिवाकरं देवं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ३॥

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
आस॒`त्येन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवेश॑यन्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑
हि॒रण्॒यये॑न सवि॒तारथे॒नादे॒वो या॑ति॒ भुव॑नावि॒पश्यन्॑ (यथाशक्ति जपेत्)
सूर्याय हृदयाय नमः
तेजोमूर्तये शिरसे स्वाहा
वरदाय शिखायै वषट्
हंसाय कवचाय हुम्
शान्ताय नेत्रत्रयाय वौषट्
कर्मसाक्षिणे अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
धृतपद्मद्वयं भानुं तेजोमण्डलमध्यगम्
सर्वाधिव्याधिशमनं छायाश्लिष्टतनुं भजे १॥
पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः पद्मद्युतिः सप्ततुरङ्गवाहः
दिवाकरो लोकगुरुः किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देवः २॥
द्विभुजं पद्महारं वरदं मकुटान्वितम्
ध्यायेद्दिवाकरं देवं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ३॥

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति श्रीसूर्यमहामन्त्रः
_________________________________________
चन्द्रः
अथ सोममन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीसोममहामन्त्रस्य गौतम ऋषिः गायत्री छन्दः
सोमो देवता सां बीजम् सीं शक्तिः सूं कीलकम्
मम श्रीसोमग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
सोमाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
निशाकराय तर्जनीभ्यां स्वाहा
क्षीरोदार्णवसंभवाय मध्यमाभ्यां वषट्
लक्ष्मीसहोदराय अनामिकाभ्यां हुम्
तारकेशाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्
सुधामूर्तये करतलकरपृष्ठाभां फट्
सोमाय हृदयाय नमः
निशाकराय शिरसे स्वाहा
क्षीरोदार्णवसंभवाय शिखायै वषट्
लक्ष्मीसहोदराय कवचाय हुम्
तारकेशाय नेत्रत्रयाय वौषट्
सुधामूर्तये अस्त्राय फट्
भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
गदाधरधरं देवं श्वेतवर्णं निशाकरम्
ध्यायेदमृतसंभूतं सर्वकामफलप्रदम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
आप्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वतः॑ सोम॒ वृष्णि॑यम्
भवा॒ वाज॑स्य सङ्ग॒थे ॥   (यथाशक्ति जपेत्)

सोमाय हृदयाय नमः
निशाकराय शिरसे स्वाहा
क्षीरोदार्णवसंभवाय शिखायै वषट्
लक्ष्मीसहोदराय कवचाय हुम्
तारकेशाय नेत्रत्रयाय वौषट्
सुधामूर्तये अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानं
गदाधरधरं देवं श्वेतवर्णं निशाकरम्
ध्यायेदमृतसंभूतं सर्वकामफलप्रदम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति सोममन्त्रः
_________________________________________
  अङ्गारकः
अथ अङ्गारकमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीअङ्गारकमहामन्त्रस्य विरूपाक्ष ऋषिः
गायत्री छन्दः अङ्गारको देवता
मम श्रीअङ्गारकग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
अङ्गारकाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
धरणीसुताय तर्जनीभ्यां नमः
रक्तवाससे मध्यमाभ्यां नमः
रक्तलोचनाय अनामिकाभ्यां नमः
शक्तिधराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
कर्मभावनाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
अङ्गारकाय हृदयाय नमः
धरणीसुताय शिरसे स्वाहा
रक्तवाससे शिखायै वषट्
रक्तलोचनाय कवचाय हुम्
शक्तिधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
कर्मभावनाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
रक्तमाल्यांबरधरं हेमरूपं चतुर्भुजम्
शक्तिरूपं गदापद्मं धारयन्तं करांबुजैः

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्या अ॒यम्
अ॒पाग्वम् रेताग्वम्॑सि जिन्वति (यथाशक्ति जपेत्)
अङ्गारकाय हृदयाय नमः
धरणीसुताय शिरसे स्वाहा
रक्तवाससे शिखायै वषट्
रक्तलोचनाय कवचाय हुम्
शक्तिधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
कर्मभावनाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
रक्तमाल्यांबरधरं हेमरूपं चतुर्भुजम्
शक्तिरूपं गदापद्मं धारयन्तं करांबुजैः

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति अङ्गारकमहामन्त्रः
_________________________________________
  बुधः
अथ बुधमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीबुधमहामन्त्रस्य मधुच्छन्द ऋषिः तृष्टुप्छन्दः
बुधो देवता बुधप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः
बुधाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
सौम्याय तर्जनीभ्यां नमः
सिंहारूढाय मध्यमाभ्यां नमः
चतुर्बाहवे अनामिकाभ्यां नमः
गदाधराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
सोमपुत्राय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
बुधाय हृदयाय नमः
सौम्याय शिरसे स्वाहा
सिंहारूढाय शिखायै वषट्
चतुर्बाहवे कवचाय हुम्
गदाधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
सोमपुत्राय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
पीतांबरः पीतवपुः किरीटी चतुर्भुजो दण्डधरश्च सौम्यः
चर्मासिधृत् सोमसुतः सदा मे सिंहाधिरूढो वरदो बुधः स्यात्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
उद्बु॑द्ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृह्येनमिष्टापू॒र्ते स॒ग्वम्सृ॑जेथाम॒यं च॑
पुनः॑ कृ॒ण्वग्वम्स्त्वा॑ पि॒तरं॒   युवा॑नम॒न्वाताग्वम्॑सी॒त्त्वयि॒ तन्तु॑मे॒तम् (यथाशक्ति जपेत्)

बुधाय हृदयाय नमः
सौम्याय शिरसे स्वाहा
सिंहारूढाय शिखायै वषट्
चतुर्बाहवे कवचाय हुम्
गदाधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
सोमपुत्राय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
पीतांबरः पीतवपुः किरीटी चतुर्भुजो दण्डधरश्च सौम्यः
चर्मासिधृत् सोमसुतः सदा मे सिंहाधिरूढो वरदो बुधः स्यात्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति बुधमहामन्त्रः
_________________________________________
  बृहस्पतिः
अथ बृहस्पतिमन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीबृहस्पतिमहामन्त्रस्य गृत्स महर्षिः जगतीछन्दः
बृहस्पतिर्देवता बृहस्पतिप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
गुरवे अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
वाक्पतये तर्जनीभ्यां नमः
गीर्वाणवन्दिताय मध्यमाभ्यां नमः
वरदाय अनामिकाभ्यां नमः
सुराचार्याय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
कमण्डलुधराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
गुरवे हृदयाय नमः
वाक्पतये शिरसे स्वाहा
गीर्वाणवन्दिताय शिखायै वषट्
वरदाय कवचाय हुम्
सुराचार्याय नेत्रत्रयाय वौषट्
कमण्डलुधराय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
वराक्षमालिकादण्डकमण्डलुधरं विभुम्
पुष्परागाङ्कितं पीतं वरदं भावयेद्गुरुम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
बृह॑स्पते॒ अति॒यद॒र्यो अर्हा॑'द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु
यद्दी॒दय॒च्छव॑सर्तप्रजात॒ तद॒स्मासु द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम् (यथाशक्ति जपेत्)

गुरवे हृदयाय नमः
वाक्पतये शिरसे स्वाहा
गीर्वाणवन्दिताय शिखायै वषट्
वरदाय कवचाय हुम्
सुराचर्याय नेत्रत्रयाय वौषट्
कमण्डलुधराय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
वराक्षमालिकादण्डकमण्डलुधरं विभुम्
पुष्परागाङ्कितं पीतं वरदं भावयेद्गुरुम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति बृहस्पतिमन्त्रः
_________________________________________
  शुक्रः
अथ शुक्रमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीशुक्रमहामन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिः
त्रिष्टुप्छन्दः शुक्रो देवता
मम श्रीशुक्रग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
दानवपूजिताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
दैत्याचार्याय तर्जनीभ्यां नमः
वरदाय मध्यमाभ्यां नमः
श्वेतवस्त्राय अनामिकाभ्यां नमः
शुक्राय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
कमण्डलुधराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
दानवपूजिताय हृदयाय नमः
दैत्याचार्याय शिरसे स्वाहा
वरदाय शिखायै वषट्
श्वेतवस्त्राय कवचाय हुम्
शुक्राय नेत्रत्रयाय वौषट्
कमण्डलुधराय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
जटिलं चाक्षसूत्रं वरदण्डकमण्डलुम्
श्वेतवस्त्रोज्ज्वनं शुक्रं सर्वदानवपूजितम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
प्रवः॑ शु॒क्राय॑ भा॒नवे॑ भरद्वँ ह॒व्यम् म॒तिं चा॒ग्नये॒ सुपू॑तम्
यो दैव्या॑नि॒ मानु॑षा जनूँष्य॒न्तर्विश्वा॑नि वि॒द्मना॒ जिगा॑ति

अथवा
शु॒क्रं ते॑ अ॒न्यद् य॑ज॒तन्ते॑ अन्य॒द्विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒द्यौरि॑वासि
विश्वा॒ हि मा॒या अव॑सि स्वधा वो भ॒द्रा ते॑ पूषन्नि॒हरा॒तिर॑स्तु  (यथाशक्ति जपेत्)

दानवपूजिताय हृदयाय नमः
दैत्याचार्याय शिरसे स्वाहा
वरदाय शिखायै वषट्
श्वेतवस्त्राय कवचाय हुम्
शुक्राय नेत्रत्रयाय वौषट्
कमण्डलुधराय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
जटिलं चाक्षसूत्रं वरदण्डकमण्डलुम्
श्वेतवस्त्रोज्ज्वनं शुक्रं सर्वदानवपूजितम्

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति शुक्रमहामन्त्रः
_________________________________________
  शनैश्चरः
अथ शनैश्चरमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीशनैश्चरमहामन्त्रस्य उरुमित्र ऋषिः
गायत्रीछन्दः शनैश्चरो देवता
मम श्रीशनैश्चरग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
शनैश्चराय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः
अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः
सौरये अनामिकाभ्यां नमः
अभयङ्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ऊर्ध्वरोम्णे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
शनैश्चराय हृदयाय नमः
मन्दगतये शिरसे स्वाहा
अधोक्षजाय शिखायै वषट्
सौरये कवचाय हुम्
अभयङ्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्
ऊर्ध्वरोम्णे अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान्
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदास्तु मह्यं वरदः प्रसन्नः

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑'
शं योर॒भिस्र॑वन्तु नः (यथाशक्ति जपेत्)

शनैश्चराय हृदयाय नमः
मन्दगतये शिरसे स्वाहा
अधोक्षजाय शिखायै वषट्
सौरये कवचाय हुम्
अभयङ्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्
ऊर्ध्वरोम्णे अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान्
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदास्तु मह्यं वरदः प्रसन्नः

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति शनैश्चरमहामन्त्रः
_________________________________________
  राहुः
अथ राहुमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीराहुमहामन्त्रस्य वामदेव ऋषिः गायत्रीछन्दः
राहुर्देवता राहुप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
धूम्रवर्णाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
कराळवदनाय तर्जनीभ्यां नमः
खण्डवराय मध्यमाभ्यां नमः
महाशूराय अनामिकाभ्यां नमः
त्रिशूलधराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
नीलसिंहासनस्थाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
धूम्रवर्णाय हृदयाय नमः
कराळवदनाय शिरसे स्वाहा
खण्डवराय शिखायै वषट्
महाशूराय कवचाय हुम्
त्रिशूलधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
नीलसिंहासनस्थाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
कराळवदनं खड्गचर्मशूलवरान्वितम्
नीलसिंहासनं राहुं ध्यायेद्रोगप्रशान्तये

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
कया॑न्श्चि॒त्र आभु॑वदू॒ती स॒दावृ॑ध॒स्सखा॑'
कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता (यथाशक्ति जपेत्)

धूम्रवर्णाय हृदयाय नमः
कराळवदनाय शिरसे स्वाहा
खण्डवराय शिखायै वषट्
महाशूराय कवचाय हुम्
त्रिशूलधराय नेत्रत्रयाय वौषट्
नीलसिंहासनस्थाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
कराळवदनं खड्गचर्मशूलवरान्वितम्
नीलसिंहासनं राहुं ध्यायेद्रोगप्रशान्तये

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि
इति राहुमहामन्त्रः
_________________________________________
   केतुः
अथ केतुमहामन्त्रप्रारंभः
अस्य श्रीकेतुमहामन्त्रस्य मयच्छन्द ऋषिः
गायत्री छन्दः केतुर्देवता
मम श्रीकेतुग्रहप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
धूम्रवर्णय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
द्विबाहवे तर्जनीभ्यां नमः
केतवे मध्यमाभ्यां नमः
विकृताननाय अनामिकाभ्यां नमः
गृध्रासनाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
लंबकाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
धूम्रवर्णाय हृदयाय नमः
द्विबाहवे शिरसे स्वाहा
केतवे शिखायै वषट्
विकृताननाय कवचाय हुम्
गृध्रासनाय नेत्रत्रयाय वौषट्
लंबकाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः

ध्यानम्
धूम्रवर्णं द्विबाहुं केतुं विकृताननम्
गृध्रासनं गतं नित्यं ध्यायेत्सर्वफलाप्तये

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

मूलमन्त्रः
के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑ के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑'
मु॒षद्भि॑रजायथाः (यथाशक्ति जपेत्)

धूम्रवर्णाय हृदयाय नमः
द्विबाहवे शिरसे स्वाहा
केतवे शिखायै वषट्
विकृताननाय कवचाय हुम्
गृध्रासनाय नेत्रत्रयाय वौषट्
लंबकाय अस्त्राय फट्
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्विमोकः

ध्यानम्
धूम्रवर्णं द्विबाहुं केतुं विकृताननम्
गृध्रासनं गतं नित्यं ध्यायेत्सर्वफलाप्तये

लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं आकाशात्मने पुष्पाणि समर्पयामि
यं वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं वह्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं अमृतात्मने अमृतोपहारं निवेदयामि
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् समर्पयामि

इति केतुमहामन्त्रः