Wednesday, August 5, 2015

॥ श्रीनील सरस्वतीस्तोत्रम् ॥

॥ श्रीनील सरस्वतीस्तोत्रम् ॥

     श्री गणेशाय नमः ॥

घोररूपे महारावे सर्वशत्रु भयङ्करी ।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥ १॥

ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्ध गन्धर्व सेविते ।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥ २॥

जटाजूट समायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणी ।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥ ३॥

सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोऽस्तु ते ।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणागतम् ॥ ४॥

जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला ।
मूढतां हर मे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥ ५॥

ह्रूं ह्रूङ्कारमये देवि बलिहोमप्रिये नमः ।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम् ॥ ६॥

बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देवि मे ।
मूढत्वं च हरेर्देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥ ७॥

इन्द्रादिविलसन्देववन्दिते करुणामयी ।
तारे तारधिनाथास्थे त्राहि मां शरणागतम् ॥ ८॥

     ॥ अथ फलश्रुतिः ॥

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां च पठेन्नरः ।
षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १॥

मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम् ।
विध्यार्थी लभते विद्यां तर्कव्याकरणादिकाम् ॥ २॥

इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयान्वितः ।
तस्य शत्रुः क्षयं याति महाप्रज्ञा प्रजायते ॥ ३॥

पीडायां यापि सङ्ग्रामे जाड्ये दाने तथा भये ।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशयः ।
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ।
  ॥ इति श्री नील सरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


Nilasaraswati is a form of Goddess Tara, the second deity in the list of famous Dashamahavidya. Her iconography is close to Goddess Kali as opposed to the same of Goddess Saraswati in the Vedas. Other popular forms of Godess Tara are Tarini and Ugra-Tara.

Devi Nilasaraswati is the Ishta-devi of sage Vashista. It is well known in the society of tantra practitioners that she puts her worshipper to extreme challenges before really granting siddhi. For example, sage Vashista himself was plucked off several times in this sadhana despite performing extreme austerities for many many years. As a result the sage did put a curse on Tara-mantra. The success of Brahmananda Giri (of Digamvaritala Bangladesh, the Paratpara guru of Krishnananda Agamvagisha) in this sadhana is a story worth knowing. In the recent past, she was worshipped by Vamdeva or Bamakhyapa (the crazy Bama), the Bhairava of Tarapith on the same 'pancha-mundi-asan' (the seat of five skulls) below the Shalmali tree (known as Mundamalinitala) where sage Vashista is supposed to have performed his sadhana.

Amongst the several boons Nilasaraswati grants are poesy and eloquence. Moreover, she grants 'vaksiddhi' for free or resides in the tounge of the worshipper, and, this is the precise reason that explains her name.

Brihannila Tantra is a source to know more of her.

For Sharp Mind - Aarudha Saraswati stotra ॥ आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्र ॥

प्रार्थना
आरूढ़ा श्वेतहंसैर्भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्यम्
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै:
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ॥1॥
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना
अर्चिता मुनिभि: सर्वैर्ॠषिभि: स्तूयते सदा
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वाञ्छितं लभते नरै: ॥2॥
या कुन्देंदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥3॥
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद् व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहां
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ 4॥

बीजमन्त्रगर्भित स्तुति
ह्रीं ह्रीं ह्रद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्याङ्घ्रिपद्मे
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोदसम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे ॥5॥
ऐं ऐं ऐं दृष्टमन्त्रे कमलभवमुखाम्भोजभूतस्वरूपे
रूपारूपप्रकाशे सकलगुणमये निर्गुणे निर्विकारे
न स्थूले नैव सूक्ष्मेऽप्यविदितविभवे नापि विज्ञानतत्त्वे
विश्वे विश्वान्तरात्मे सुरवरनमिते निष्कले नित्यशुद्धे ॥6॥
ह्रीं ह्रीं ह्रीं जाप्यतुष्टे शशिरुचिमुकुटे वल्लकीव्यग्रहस्ते
मातर्मातर्नमस्ते दह दह जड़तां, देहि बुद्धिं प्रशस्तां
विद्ये वेदान्तवेद्ये परिणतपठिते मोक्षदे मुक्तिमार्गे
मार्गातीतस्वरूपे भव मम वरदा शारदे शुभ्रहारे ॥7॥
धीं धीं धीं धारणाख्ये धृतिमतिनतिर्नामभि: कीर्तनीये
नित्येऽनित्ये निमित्ते मुनिगणनमिते नूतने वै पुराणे
पुण्ये पुण्यप्रवाहे हरिहरनमिते नित्यशुद्धे सुवर्णे
मातर्मात्रार्धतत्त्वे मतिमतिमतिदे माधवप्रीतिमोदे ॥8॥
हूं हूं हूं स्वरूपे दह दह दुरितं पुस्तकव्यग्रहस्ते
सन्तुष्टाकारचित्ते स्मितमुखि सुभगे जृम्भिणि स्तम्भविद्ये
मोहे मुग्धप्रवाहे कुरु मम विमतिध्वान्तविध्वंसमीड्ये
गीर्गौरवाग्भारति त्वं कविवररसनासिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ॥9॥

आत्मनिवेदन
स्तौमि त्वां त्वां च वन्दे मम खलु रसनां नो कदाचित्त्यजेथा
मा मे बुद्धिर्विरुद्धा भवतु न च मनो देवि मे यातु पापम्
मा मे दु:खं कदाचित् क्वचिदपि विषयेऽप्यस्तु मे नाकुलत्वं
शास्त्रे वादे कवित्वे प्रसरतु मम धीर्मास्तु कुण्ठा कदापि ॥10॥
इत्येतै: श्लोकमुख्यै: प्रतिदिनमुषसि स्तौति यो भक्तिनम्रो
वाणीं वाचस्पतेरप्यविदितविभवो वाक्पटुमृष्टकण्ठ:
या स्यादिष्टार्थलाभै: सुतमिव सततं वर्धते सा च देवी
सौभाग्यं तस्य लोके प्रभवति कवितां विघ्नमस्तं प्रयाति॥11॥
निर्विघ्नं तस्य विद्या प्रभवति सततं चाश्रुतग्रन्थबोध:
कीर्तिस्त्रैलोक्यमध्ये निवसित वदने शारदा तस्य साक्षात्
दीर्घायुर्लोकपूज्य: सकलगुणनिधि: सन्ततं राजमान्यो
वाग्देव्या: सम्प्रसादात् त्रिजगति विजयी सत्सभासु प्रपूज्य: ॥12॥

फलश्रुति
ब्रह्मचारी व्रती मौनी त्रयोदश्यां निरामिष:
सारस्वतो जन: पाठात्सकृदिष्टार्थलाभवान्
पक्षद्वये त्रयोदश्यां एकविंशतिसंख्यया
अविच्छिन: पठेद् धीमान् ध्यात्वा देवीं सरस्वतीं ॥14॥
सर्वपापविनिर्मुक्त: सुभगो लोकविश्रुत:
वाञ्छितं फलमाप्नोति लोकेऽस्मिन्नात्र संशय:
ब्रह्मणेति स्वयं प्रोक्तं सरस्वत्या: स्तवं शुभम्
प्रयत्नेन पठेन्नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥15॥
॥ इति आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

प्रजापति ब्रह्माजी द्वारा रचित यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है। बचपन से ही इसके पाठ की आदत विद्यार्थी में होना चाहिए। 
इसके नित्य पाठ से बुद्धि तीव्र होती है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है, प्रतिभा विकसित होती है एवं दोनों पक्ष (कृष्ण तथा शुक्ल) की त्रयोदशी को निरामिष रह 21 बार निरंतर पाठ करने से वाञ्छित फल प्राप्त होता है।




Thursday, February 5, 2015

Shri Narsingh sadhana Vidhi श्री नृसिंह साधना विधि

श्री नृसिंह साधना विधि
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को श्री नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है. ( इस वर्ष 20 मई 2016 को श्री नृसिंह जयंती पडता है) भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं, पौराणिक मान्यता एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था. 

हिन्दू पंचांग के अनुसार श्री नरसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है. पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह रूप में अवतार लिया तथा दैत्यों का अंत कर धर्म कि रक्षा की. अत: इस कारणवश यह दिन भगवान श्री नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है.

श्री नरसिंह जयंती कथा | Story of Narasimha Jayanti
श्री नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है. श्री नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था. धर्म ग्रंथों में भगवान के इस अवतरण के बारे विस्तार पूर्वक विवरण प्राप्त होता है जो इस प्रकार है- प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे उनकी पत्नी का नाम दिति था. उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे का हिरण्यकशिपु था.

हिरण्याक्ष को भगवान श्री विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वाराह रूप धरकर मार दिया था. अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया. सहस्त्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया, उसकी तपस्या से प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने उसे 'अजेय' होने का वरदान दिया. वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, लोकपालों को मार भगा दिया और स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया.

देवता निरूपाय हो गए थे वह असुर को किसी प्रकार वे पराजित नहीं कर सकते थे अहंकार से युक्त वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा. इसी दौरान हिरण्यकशिपु कि पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया एक राक्षस कुल में जन्म लेने पर भी प्रह्लाद में राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण मौजूद नहीं थे तथा वह भगवान नारायण का भक्त था तथा अपने पिता के अत्याचारों का विरोध करता था.

भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए हिरण्यकशिपु ने बहुत प्रयास किए, नीति-अनीति सभी का प्रयोग किया किंतु प्रह्लाद अपने मार्ग से विचलित न हुआ तब उसने प्रह्लाद को मारने के षड्यंत्र रचे मगर वह सभी में असफल रहा. भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद हर संकट से उबर आता और बच जाता था.
इस बातों से क्षुब्ध हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिन्दा ही जलाने का प्रयास किया. होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती परंतु जब प्रल्हाद को होलिका की गोद में बिठा कर अग्नि में डाला गया तो उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई किंतु प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ.

इस घटना को देखकर हिरण्यकशिपु क्रोध से भर गया उसकी प्रजा भी अब भगवान विष्णु को पूजने लगी, तब एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि बता, तेरा भगवान कहाँ है? इस पर प्रह्लाद ने विनम्र भाव से कहा कि प्रभु तो सर्वत्र हैं, हर जगह व्याप्त हैं. क्रोधित हिरण्यकशिपु ने कहा कि 'क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ (खंभे) में भी है? प्रह्लाद ने हाँ, में उत्तर दिया.

यह सुनकर क्रोधांध हिरण्यकशिपु ने खंभे पर प्रहार कर दिया तभी खंभे को चीरकर श्री नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया. श्री नृसिंह ने प्रह्लाद की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो भी मेरा व्रत करेगा वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त होगा अत: इस कारण से दिन को श्री नृसिंह जयंती-उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

भगवान श्री नृसिंह जयंती पूजा | Worship of Lord Narasimha
श्री नृसिंह जयंती के दिन व्रत-उपवास एवं पुजा अर्चना कि जाती है इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए तथा भगवान श्री नृसिंह की विधी विधान के साथ पूजा अर्चना करें.
अपने गुरूदेव, गणेश जी आदि का ध्यान करने के पश्चात श्री नृसिंह भगवान का धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन करना चाहिए
भगवान श्री नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए तत्पश्चात वेदमंत्रों से इनकी प्राण-प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. भगवान श्री नरसिंह जी की पूजा के लिए फल, पुष्प, पंचमेवा, कुमकुम केसर, नारियल, अक्षत व पीताम्बर रखें. गंगाजल, काले तिल, पञ्च गव्य, व हवन सामग्री का पूजन में उपयोग करें.
भगवान श्री नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके श्री नरसिंह गायत्री मंत्र का जाप करें. 

श्री नृसिंह गायत्री मंत्र
ॐ उग्रनृृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नोनृसिंह प्रचोदयात् ।
पूजा पश्चात एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस श्री नृसिंह भगवान जी के मंत्र का जप करना चाहिए. इस दिन व्रती को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए. इस व्रत करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है भगवान श्री नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

नरसिंह मंत्र । Narasimha Mantra
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् I
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम् II
ॐ नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः ।
इन मंत्रों का जाप करने से समस्त दुखों का निवारण होता है तथा भगवान श्री नृसिंह की कृपा प्राप्त होती है.


श्री अथर्वण वेदोक्त नृसिंहमालामन्त्रः
श्री गणेशाय नमः | 
अस्य श्री नृसिंहमाला मन्त्रस्य नारदभगवान् ऋषिः | अनुष्टुभ् छन्दः | श्री नृसिंहोदेवता | आं बीजम् | लं शवित्तः | मेरुकीलकम् | श्रीनृसिंहप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः | 
ॐ नमो नृसिंहाय ज्वलामुखग्निनेत्रय शङ्खचक्रगदाप्र्हस्ताय | योगरूपाय हिरण्यकशिपुच्छेदनान्त्रमालाविभुषणाय हन हन दह दह वच वच रक्ष वो नृसिंहाय पुर्वदिषां बन्ध बन्ध रौद्रभसिंहाय दक्षिणदिशां बन्ध  बन्ध पावननृसिंहाय पश्चिमदिशां बन्ध बन्ध दारुणनृसिंहाय उत्तरदिशां बन्ध बन्ध ज्वालानृसिंहाय आकाशदिशां बन्ध बन्ध लक्ष्मीनृसिंहाय पातालदिशां  बन्ध बन्ध कः कः कंपय कंपय आवेशय आवेशय अवतारय अवतारय शीघ्रं शीघ्रं | ॐ नमो नारसिंहाय नवकोटिदेवग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय अष्टकोटिगन्धर्व ग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय षट्कोटिशाकिनीग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय पंचकोटि पन्नगग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय चतुष्कोटि ब्रह्मराक्षसग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय द्विकोटिदनुजग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय कोटिग्रहोच्चाटनाय| ॐ नमो नारसिंहाय अरिमूरीचोरराक्षसजितिः वारं वारं | श्रीभय चोरभय व्याधिभय सकल भयकण्टकान् विध्वंसय विध्वंसय | शरणागत वज्रपंजराय विश्वहृदयाय प्रल्हादवरदाय क्षरौं श्रीं नृसिंहाय स्वाहा | ॐ नमो नारसिंहाय मुद्गल शङ्खचक्र गदापद्महस्ताय नीलप्रभांगवर्णाय भीमाय भीषणाय ज्वाला करालभयभाषित श्री नृसिंहहिरण्यकश्यपवक्षस्थलविदार्णाय | जय जय एहि एहि भगवन् भवन गरुडध्वज गरुडध्वज मम सर्वोपद्रवं वज्रदेहेन चूर्णय चूर्णय आपत्समुद्रं शोषय शोषय | असुरगन्धर्वयक्षब्रह्मराक्षस भूतप्रेत पिशाचदिन विध्वन्सय् विध्वन्सय् | पूर्वाखिलं मूलय मूलय | प्रतिच्छां स्तम्भय परमन्त्रपयन्त्र परतन्त्र परकष्टं छिन्धि छिन्धि भिन्धि हं फट् स्वाहा | इति श्री अथर्वण वेदोवत्तनृसिंहमालामन्त्रः समाप्तः | श्री नृसिम्हार्पणमस्तु ||

शत्रु-बाधा निवारक ‘दारूण-सप्तक’
जब हिरण्यकश्यप को भगवान् श्री नृसिंह ने अपनी गोद में रखकर अपने खर-तर नखों से उसके उदर को सर्वथा विदीर्ण कर चीर दिया और प्रह्लाद का दुःख दूर हो गया । तदनन्तर श्री भगवान् श्री नृसिंह का वह क्रोध शान्त न हुआ, तब भगवान् विष्णु के आग्रह पर भगवान् रुद्र ने श्री शरभेश्वर (पक्षिराज, पक्षीन्द्र, पंखेश्वर) का रुप धारण कर, अपनी लौह के समान कठिन त्रोटी (चोंच) से, नृसिंह देव के ब्रह्म-रन्ध्र को विदीर्ण कर दिया, जिससे वे पुनः शान्त हो गए ।

संक्षिप्त अनुष्ठान विधि-
स्वस्तिवाचन करके गुरु एवं गणपति पूजन करें।
संकल्प करके श्री भैरव की पूजा करें- दक्षिण दिशा में मुख रखें। काले कम्बल का आसन प्रयुक्त करें।
दो दीप रखें-एक घृत का देवता के दाँये और दूसरा सरसों के तेल का अथवा करंज का देवता के बाँये रखें।

आकाश भैरव शरभ का चित्र मिल जाए तो सर्वोत्तम है, अन्यथा एक रक्तवर्ण वस्त्र पर गेहूँ की ढेरी लगाएँ, उस पर जल से पूर्ण ताम्र कलश रखें।

उसपर श्रीफल रखकर शरभ भैरव का आवाहन, ध्यान एवं षोडशोपचार पूजन करे।

नैवेद्य लगाएं और जप पाठ शुरु करें।

इसके दो प्रकार के पाठ हैं-
१. स्तोत्र पाठ, १०८ बार मन्त्र जप एवं पुनः स्तोत्र पाठ।
२. १०८ बार मन्त्र जप, ७ बार स्तोत्र पाठ और पुनः १०८ बार मन्त्र जप। फल-श्रुति के अनुसार आदित्यवार से मंगलवार तक रात्रि में दस बार पढ़ने से शत्रु-बाधा दूर हो जाती है।
हवन, तर्पण, मार्जन एवं ब्रह्मभोज दशांश क्रम से करें, संभव न हो तो इसके स्थान पर पाठ एवं जप अधिक संख्या में करें।

निग्रह दारुण सप्तक स्तोत्र या शरभेश्वर स्तोत्र
विनियोग- ॐ अस्य दारुण-सप्तक-महामन्त्रस्य श्री सदाशिव ऋषिः वृहती छन्सः श्री शरभो देवता ममाभीष्ट-सिद्धये जपे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यास- श्रीसदाशिव ऋषये नमः शिरसि। वृहती छन्दसे नमः मुखे। श्रीशरभ-देवतायै नमः हृदि। ममाभिष्ट-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।

।। मूल स्तोत्र ।।
कापोद्रेकाऽति वीर्यं निखिल-परिकरं तार-हार-प्रदीप्तम्।
ज्वाला-मालाग्निदश्च स्मर-तनु-सकलं त्वामहं शालु-वेशं।।
याचे त्वत्पाद्-पद्म-प्रणिहित-मनसं द्वेष्टि मां यः क्रियाभिः।
तस्य प्राणावसानं कुरु शिव ! नियतं शूल-भिन्नस्य तूर्णम्।।१
शम्भो ! त्वद्धस्त-कुन्त-क्षत-रिपु-हृदयान्निस्स्त्रवल्लोहितौघम्।
पीत्वा पीत्वाऽति-दर्पं दिशि-दिशि सततं त्वद्-गणाश्चण्ड-मुख्याः।।
गर्ज्जन्ति क्षिप्र-वेगा निखिल-भय-हराः भीकराः खेल-लोलाः।
सन्त्रस्त-ब्रह्म-देवा शरभ खग-पते ! त्राहि नः शालु-वेश ! ।।२
सर्वाद्यं सर्व-निष्ठं सकल-भय-हरं नानुरुप्यं शरण्यम्।
याचेऽहं त्वाममोघं परिकर-सहितं द्वेष्टि योऽत्र स्थितं माम्।।
श्रीशम्भो ! त्वत्-कराब्ज-स्थित-मुशल-हतास्तस्य वक्ष-स्थलस्थ-
प्राणाः प्रेतेश-दूत-ग्रहण-परिभवाऽऽक्रोश-पूर्वं प्रयान्तु।।३
द्विष्मः क्षोण्यां वयं हि तव पद-कमल-ध्यान-निर्धूत-पापाः।
कृत्याकृत्यैर्वियुक्ताः विहग-कुल-पते ! खेलया बद्ध-मूर्ते ! ।।
तूर्णं त्वद्धस्त-पद्म-प्रधृत-परशुना खण्ड-खण्डी-कृताङ्गः।
स द्वेष्टी यातु याम्यं पुरमति-कलुषं काल-पाशाग्र-बद्धः।।४
भीम ! श्रीशालुवेश ! प्रणत-भय-हर ! प्राण-हृद् दुर्मदानाम्।
याचे-पञ्चास्य-गर्व-प्रशमन-विहित-स्वेच्छयाऽऽबद्ध-मूर्ते ! ।।
त्वामेवाशु त्वदंघ्य्रष्टक-नख-विलसद्-ग्रीव-जिह्वोदरस्य।
प्राणोत्क्राम-प्रयास-प्रकटित-हृदयस्यायुरल्पायतेऽस्य।।५
श्रीशूलं ते कराग्र-स्थित-मुशल-गदाऽऽवर्त-वाताभिघाता-
पाताऽऽघातारि-यूथ-त्रिदश-रिपु-गणोद्भूत-रक्तच्छटार्द्रम्।।
सन्दृष्ट्वाऽऽयोधने ज्यां निखिल-सुर-गणाश्चाशु नन्दन्तु नाना-
भूता-वेताल-पुङ्गाः क्षतजमरि-गणस्याशु मत्तः पिवन्तु।।६
त्वद्दोर्दण्डाग्र-शुण्डा-घटित-विनमयच्चण्ड-कोदण्ड-युक्तै-
र्वाणैर्दिव्यैरनेकैश्शिथिलित-वपुषः क्षीण-कोलाहलस्य।।
तस्य प्राणावसानं परशिव ! भवतो हेति-राज-प्रभावै-
स्तूर्णं पश्यामियो मां परि-हसति सदा त्वादि-मध्यान्त-हेतो।।७

।। फल-श्रुति ।।
इति निशि प्रयतस्तु निरामिषो, यम-दिशं शिव-भावमनुस्मरन्।
प्रतिदिनं दशधाऽपि दिन-त्रयं, जपति यो ग्रह-दारुण-सप्तकम्।।८
इति गुह्यं महाबीजं परमं रिपुनाशनम्।
भानुवारं समारभ्य मंगलान्तं जपेत् सुधीः।।९
।। इत्याकाश भैरव कल्पे प्रत्यक्ष सिद्धिप्रदे नरसिंह कृता शरभस्तुति ।।

श्रीशरभेश्वर मन्त्र विधान
विनियोग- ॐ अस्य श्रीशरभेश्वर मन्त्रेश्वर कालाग्नि-रुद्रः ऋषिः जगती छंदः श्री शरभो देवता ॐ खँ बीजं, स्वाहा शक्तिः फट् कीलक मम कार्य सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास- ॐ कालाग्नि-रुद्रः ऋषये नमः शिरसि। ॐ अति जगती छन्दसे नमः मुखे। श्री शरभो देवतायै नमः हृदये। ॐ खं बीजाय नमः गुह्ये। स्वाहा शक्तये नमः पादयो। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

कर-न्यास- ॐ खें खां अं कं खं गं घं ङं आं अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ खं फट् इं चं छं जं झं ञं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ प्राणग्रहासि प्राणग्रहासि हुं फट् उं टं ठं डं ढं णं ऊं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ सर्वशत्रु संहारणाय एं तं थं दं धं नं ऐं अनामिकाभ्यां नमः। ॐ शरभ-शालुवाय ओं पं फं बं भं मं औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ पक्षि-राजाय हुं फट् स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादिन्यास- ॐ खें खां अं कं खं गं घं ङं आं हृदयाय नमः। ॐ खं फट् इं चं छं जं झं ञं शिरसे स्वाहा। ॐ प्राणग्रहासि प्राणग्रहासि हुं फट् उं टं ठं डं ढं णं ऊं शिखायै वषट्। ॐ सर्वशत्रु संहारणाय एं तं थं दं धं नं ऐं कवचाय हुम्। ॐ शरभ-शालुवाय ओं पं फं बं भं मं औं नेत्र त्रयाय वोषट्। ॐ पक्षि-राजाय हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट्।

ध्यानम्-
चन्द्रार्काग्निस्त्रि-दृष्टिः कुलिश-वर-नखश्चञ्चलोत्युग्र-जिह्वः।
कालि-दुर्गा च पक्षौ हृदय जठरगो भैरवो वाडवाग्निः।।
ऊरुस्थौ व्याधि-मृत्यू शरभ-वर-खगश्चण्ड-वाताति-योगः।
संहर्त्ता सर्व-शत्रून् स जयति शरभः शालुवः पक्षिराजः।।१
मृगस्त्वर्ध-शरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चुना द्विजः,
अधो-वक्त्रश्चतुष्पाद ऊर्ध्व-वक्त्रश्चतुर्भुजः।
कालाग्नि-दहनोपेतो नील-जीमूत-सन्निभः,
अरिस्तद्-देशनादेव विनष्ट-बल-विक्रमः।।२
सटा-छटोग्र-रुपाय पक्ष-विक्षिप्त-भूभृते,
अष्ट-पादाय रुद्राय नमः शरभ-मूर्तये।।३

श्री शरभेश्वर मन्त्र
१. “ॐ खें खां खं फट् प्राणग्रहासि प्राणग्रहासि हुं फट् सर्वशत्रु संहारणाय शरभशालुवाय पक्षिराजाय हुं फट् स्वाहा।” (द्विचत्वारिंशदक्षर-शरभ तन्त्र)
२. “ॐ नमोऽष्टपादाय सहस्त्रबाहवे द्विशिरसे त्रिनेत्राय द्विपक्षायाग्नि वर्णाय मृगविह्ङ्गरुपाय वीर शरभेश्वराय ॐ।”
इनमें से किसी एक मन्त्र का जप करें।

पुरश्चरण-
अनुष्ठान से पुर्व पुरश्चरण भी विहित है, इसकी दो विधियां है-
१. यह नौ दिन में हो सकता है। इसमें पहले दिन पूर्वाङ्ग तथा अन्तिम एक दिन उत्तराङ्ग का हो। बीच में सात दिन ७-७ बार पाठ करें।
२. यह आठ दिन में भी हो सकता है। स्तोत्र के आठ दिन तक आठ-आठ पाठ नित्य रात्रि में करे। आठ दिन में मन्त्र के जप ११ हजार कर लें।

शरभेश्वर के अन्य मन्त्र
१.  एक-चत्वारिंशदक्षरः
“ॐ खं खां खं फट् शत्रून् ग्रससि ग्रससि हुं फट् सर्वास्त्र-संहारणाय शरभाय पक्षि-राजाय हुं फट् स्वाहा नमः।” (मेरु-तन्त्र)
ऋषि वासुदेव, छन्द जगती, देवता कालाग्नि-रुद्र शरभ, बीज ‘खं’, शक्ति ‘स्वाहा’। मन्त्र के ४, ९, १०, ७, ५, ६ अक्षरों से षडङ्ग-न्यास। समस्त मन्त्र से दिग्-बन्धन कर ध्यान करें-
विद्युज्जिह्वं वज्र-नखं वडवाग्न्युदरं तथा,
व्याधि-मृत्यु-रिपुघ्नं चण्ड-वाताति-वेगिनम्।
हृद्-भैरव-स्वरुपं च वैरि-वृन्द-निषूदनं,
मृगेन्द्र-त्वक्छरीरेऽस्य पक्षाभ्यां चञ्चुना रवः।
अधो-वक्त्रश्चतुष्पाद ऊर्ध्व-दृष्टिश्चतुर्भुजः,
कालान्त-दहन-प्रख्यो नील-जीमूत-नीःस्वन्।
अरिर्यद्-दर्शनादेव विनष्ट-बल-विक्रमः,
सटा-क्षिप्त-गृहर्क्षाय पक्ष-विक्षिप्त-भूभृते।
अष्ट-पादाय रुद्राय नमः शरभ-मूर्तये।।
पुरश्चरण में एक हजार जप कर पायस से प्रतिदिन छः मास तक दशांश होम करे।

२. गायत्रीः
“ॐ पक्षि-शाल्वाय विद्महे वज्र-तुण्डाय धीमहि तन्नः शरभः प्रचोदयात् ॐ” (शरभ-तन्त्र)
“ॐ पक्षि-राजाय विद्महे शरभेश्वराय धीमहि तन्नो शरभः प्रचोदयात्” (शरभ-पटल)

३. अष्टोत्तर-शताक्षर माला-मन्त्र
“ॐ नमो भगवते शरभाय शाल्वाय सर्व-भूतोच्चाटनाय ग्रह-राक्षस-निवारणाय ज्वाला-माला-स्वरुपाय दक्ष-निष्काशनाय साक्षाद् काल-रुद्र-स्वरुपाष्ट-मूर्तये कृशानु-रेतसे महा-क्रूर-भूतोच्चाटनाय अप्रति-शयनाय शत्रून् नाशय नाशय शत्रु-पशून् गृह्ण गृह्ण खाद खाद ॐ हुं फट् स्वाहा।” (मेरु-तन्त्र)

प्रतिदिन १०८ बात छः मास तक जपने से उक्त मन्त्र सिद्ध होता है। उसके बाद पात्र में पवित्र जल रखकर सात बार उसे अभिमन्त्रित करे। इसके पीने से एक सप्ताह में सब प्रकार के ज्वर शान्त होते हैं।