Tuesday, April 5, 2016

श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र


आदिलक्ष्मी सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवी चन्द्र सहोदरी हेममये | मुनिगणमंडित मोक्षप्रदायिनी मंजुलभाषिणी वेदनुते ||
पंकजवासिनी देवसुपुजित सद्रुणवर्षिणी शांतियुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी आदिलक्ष्मी सदा पली माम |||| 
धान्यलक्ष्मी |अहिकली कल्मषनाशिनि कामिनी वैदिकरुपिणी वेदमये | क्षीरमुद्भव मंगलरूपिणी मन्त्रनिवासिनी मन्त्रनुते | |
मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पाद्युते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी धान्यलक्ष्मी सदा पली माम|| ||

|| धैर्यलक्ष्मी ||
||जयवरवर्णिनी वैष्णवी भार्गवी मन्त्रस्वरूपिणी मन्त्रम्ये |सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनी शास्त्रनुते ||
भवभयहारिणी पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धैर्यलक्ष्मी सदा पले माम ||||

|| गजलक्ष्मी ||
|| जयजय दुर्गतिनाशिनी कामिनी सर्वफलप्रद शास्त्रमये |रथगज तुरगपदादी समावृत परिजनमंडित लोकनुते ||
हरिहर ब्रम्हा सुपूजित सेवित तापनिवारिणी पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी गजलक्ष्मी रूपेण पले माम ||||

|| संतानलक्ष्मी ||
||अहिखग वाहिनी मोहिनी चक्रनि रागविवर्धिनी लोकहितैषिणी स्वरसप्त भूषित गाननुते सकल सूरासुर देवमुनीश्वर ||
मानववन्दित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी संतानलक्ष्मी त्वं पालय माम || ||

|| विजय लक्ष्मी ||
||जय कमलासनी सद्रतिदायिनी ज्ञानविकासिनी गानमये |अनुदिनमर्चित कुमकुमधूसर-भूषित वासित वाद्यनुते ||कनकधस्तुति वैभव वन्दित शंकर देशिक मान्य पदे |जय जय हे मधुसुदन कामिनी विजयलक्ष्मी सदा पालय माम || ||

|| विद्यालक्ष्मी ||
||प्रणत सुरेश्वरी भारती भार्गवी शोकविनासिनी रत्नमये |मणिमयभूषित कर्णविभूषण शांतिसमवृत हास्यमुखे || नवनिधिदायिनी कलिमहरिणी कामित फलप्रद हस्त युते | जय जय हे मधुसुदन कामिनीविद्यालक्ष्मी सदा पालय माम ||

|| धनलक्ष्मी ||
|| धिमिधिमी धिंधिमी धिंधिमी धिंधिमी दुन्दुभी नाद सुपूर्णमये | घूमघूम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते || वेदपूराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते |जय जय हे मधुसुदन कामिनी धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम ||

माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि धन में बढोतरी होती है

श्री गणेश की 32 मंगलमूर्तियां

 श्री गणेश बुद्धि और विद्या के देवता है। जीवन को विघ्र और बाधा रहित बनाने के लिए श्री गणेश उपासना बहुत शुभ मानी जाती है। इसलिए हिन्दू धर्म के हर मंगल कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की उपासना की परंपरा है। माना जाता है कि श्री गणेश स्मरण से मिली बुद्धि और विवेक से ही व्यक्ति अपार सुख, धन और लंबी आयु प्राप्त करता है।
धर्मशास्त्रों में भगवान श्री गणेश के मंगलमय चरित्र, गुण, स्वरुपों और अवतारों का वर्णन है। भगवान को आदिदेव मानकर परब्रह्म का ही एक रूप माना जाता है। यही कारण है कि अलग-अलग युगों में श्री गणेश के अलग-अलग अवतारों ने जगत के शोक और संकट का नाश किया।
इसी कड़ी में शास्त्रों में बताए गए है भगवान श्री गणेश के 32 मंगलकारी स्वरूप
श्री बाल गणपति: भुजाओं और लाल रंग का शरीर
श्री तरुण गणपतिआठ भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री भक्त गणपतिचार भुजाओं वाला सफेद रंग का शरीर
श्री वीर गणपतिदस भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री शक्ति गणपतिचार भुजाओं वाला सिंदूरी रंग का शरीर
श्री द्विज गणपतिचार भुजाधारी शुभ्रवर्ण शरीर
श्री सिद्धि गणपति: भुजाधारी पिंगल वर्ण शरीर
श्री विघ्न गणपतिदस भुजाधारी सुनहरी शरीर
श्री उच्चिष्ठ गणपतिचार भुजाधारी नीले रंग का शरीर
श्री हेरम्भ गणपतिआठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री उद्ध गणपति: भुजाधारी कनक यानि सोने के रंग का शरीर
श्री क्षिप्र गणपति: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री लक्ष्मी गणपतिआठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री विजय गणपतिचार भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री महागणपतिआठ भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री नृत्त गणपति: भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री एकाक्षर गणपतिचार भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री हरिद्रा गणपति: भुजाधारी पीले रंग का शरीर
श्री त्र्यैक्ष गणपतिसुनहरे शरीर, तीन नेत्रों वाले चार भुजाधारी
श्री वर गणपति: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री ढुण्डि गणपतिचार भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर
श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति: भुजाधारी रक्ववर्णी, त्रिनेत्र धारी
श्री ऋण मोचन गणपतिचार भुजाधारी लालवस्त्र धारी
श्री एकदन्त गणपति: भुजाधारी श्याम वर्ण शरीरधारी
श्री सृष्टि गणपतिचार भुजाधारी, मूषक पर सवार रक्तवर्णी शरीरधारी
श्री द्विमुख गणपतिपीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले
श्री उद्दण्ड गणपतिबारह भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर वाले, हाथ में कुमुदनी और अमृत का पात्र होता है।
श्री दुर्गा गणपतिआठ भुजाधारी रक्तवर्णी और लाल वस्त्र पहने हुए।
श्री त्रिमुख गणपतितीन मुख वाले, : भुजाधारी, रक्तवर्ण शरीरधारी
श्री योग गणपतियोगमुद्रा में विराजित, नीले वस्त्र पहने, चार भुजाधारी
श्री सिंह गणपतिश्वेत वर्णी आठ भुजाधारी, सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले

श्री संकष्ट हरण गणपतिचार भुजाधारी, रक्तवर्णी शरीर, हीरा जडि़त मुकूट पहने।

मंत्र: तंत्र: यन्त्र:

योगिनीतंत्र मे वर्णन है की कलयुग मे वैदिक मंत्र विष हीन सर्प के सामान होजाएगा। ऐसा कलयुग में शुद्ध और अशुद्ध के बीच में कोई भेद भावः रह जानेकी वजह से होगा। कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रो का कलयुग में उच्चारण करेगा उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के सामान होगी जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर कुआँखोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में अपना समय और उर्जा को व्यर्थ करताहै। कलयुग में वैदिक मंत्रो का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा। और गृहस्त लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा। महादेव ने बताया की वैदिक मंत्रो का पूर्ण फल सतयुग, द्वापरतथा त्रेता युग में ही मिलेगा.
तब माँ पार्वती ने महादेव से पुछा की कलयुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे? और जो फल उन्हे पूजा अर्चना से मिलता है वह उन्हे कैसे मिलेगा?
इस पर शिव जी ने कहा की कलयुगमें तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगा। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जाएगा। वह अपने तरीके से इश्वर को प्राप्त करने केलिए अनेको प्रकार के विज्ञानिक प्रयोग करेगा।
परन्तु ऐसा करने के लिएसाधक के अन्दर इश्वर को पाने का नशा और प्रयोगों से कुछ प्राप्त करने की तीव्र इच्छा  होनी चाहिए। तंत्र के प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एकतांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का ज्ञान जरुरी है।

मंत्र
मंत्र एक सिद्धांत को कहते हैं। किसी भी आविष्कार को सफल बनाने के लिए एकसही मार्ग और सही नियमों की आवश्यकता होती है। मंत्र वही सिद्धांत है जो एकप्रयोग को सफल बनाने में तांत्रिक को मदद करता है। मंत्र द्वारा ही यह पताचलता है की कौन से तंत्र को किस यन्त्र में समिलित कर के लक्ष्य तक पंहुचाजा सकता है।
मंत्र के सिद्ध होने पर ही पूरा प्रयोग सफल होता है। जैसे क्रिंग ह्रंग स्वाहा एक सिद्ध मंत्र है।
मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मंत्र में मन का अर्थ है मनन करनाअथवा ध्यानस्त होना तथा त्र का अर्थ है रक्षा। इस प्रकार मंत्र का अर्थ है ऐसा मनन करना जो मनन करने वाले की रक्षा कर सके।अर्थात मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है।
तंत्र
सृष्टि में इश्वर ने हरेक समस्या का समाधान स्वयम दिया हुआ है। ऐसी कोई बीमारी या परेशानी नही जिसका समाधान इश्वर ने इस धरती पर किसी किसी रूप में दिया हो। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं। इस समाहार से बनने वाली उस औषधि या वस्तु से प्राणियों का कल्याण होता है।
तंत्र तन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है जो वस्तु इस तन की रक्षा करे उसे ही तंत्र कहते हैं।
यन्त्र:
मंत्र और तंत्र को यदि सही से प्रयोग किया जाए तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। पर तंत्र के रसायनों को एक उचित पात्र को आवश्यकता होती है। ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र माना गया है। आसन, तलिस्मान, ताबीज इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार को आकृति को भी यन्त्र मन गया है। जैसे श्री यन्त्र, काली यन्त्र, महा मृतुन्जय यन्त्र इत्यादि।
यन्त्र शब्द यं तथा त्र के मिलाप से बना है। यं को पुर्व में यम यानी काल कहा जाता था। इसलिए जो यम से हमारी रक्षा करे उसे ही यन्त्र कहा जाता है।
इसलिए एक सफल तांत्रिक साधक को मंत्र, तंत्र और यन्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।

विज्ञानं के प्रयोगों जैसे ही यदि तीनो में से किसी की भी मात्रा या प्रकार ग़लत हुई तो सफलता नही मिलेगी।