Sunday, June 26, 2016

हरताल (HARTAL) Arsenic Sulfide, Yellow orpiment


रंग: हरताल का रंग पीला होता है।
स्वाद: इसका स्वाद फीका होता है।
स्वरूप: हरताल एक खनिज पदार्थ है।
यह चार प्रकार का होता है।:-
1. वंशपत्री
2. तब की हरताल
3. गुवरिया हरताल
4. गोदन्ती हरताल इत्यादि।
स्वभाव: यह गर्म होती है।
हानिकारक: हरताल का अधिक मात्रा में उपयोग करने से पेट में मरोड़ पैदा होता है।
दोषों को दूर करने वाला: घी और पीला हरड़, हरताल के दोषों को दूर करता है।
तुलना: मैनफल से हरताल की तुलना की जा सकती है।
मात्रा: 1 ग्राम।
गुण : हरताल मोटापे में बढ़े मांस तथा मस्सों को गिरा देती है, खुजली के दागों को मिटा देती है, प्यास बहुत बढ़ाती है, खून तथा त्वचा की खराबी को खत्म करती है, पेट के कीड़ों को मल के साथ बाहर निकाल देती है, बालों को गिराती है। यह गर्मी और विष को खत्म करने वाली है, कण्डू (खुजली), कुष्ठ (कोढ़) और मुंह के रोगों को खत्म करती है, खून के रोगों का नाश करती है। कफ पित्त, वात और फोड़ों को दूर करती है, चेहरे की चमक को बढ़ाती है, बुढ़ापे और मौत को जल्द आने नहीं देती है। चुटकी भर हरताल भस्म और उसकी : गुनी चीनी मिलाकर खाने से सभी प्रकार के वायु रोग दूर हो जाते हैं।
अशुद्ध अशोधित हरताल : यह आयु का नाश करती है, कफ और वात को बढ़ाती है। प्रमेह और ताप को उत्पन्न करती है, चेचक रोग को पैदा करती है। अशुद्ध हरताल पीली होती है और आग पर डालने से धुंआ देने लगती है। यह वात, पित्तादि दोषों को बढ़ाती है। शरीर में लंगड़ापन और कोढ (कुष्ठ) को पैदा करती है जिससे मृत्यु भी हो जाती है। अशुद्ध हरताल शरीर की सुन्दरता को खत्म करती है, बहुत ही जलन तथा अंगों की सिकुड़न और दर्द को भी दूर करती है।
जो हरताल सोने के समान रंग वाली भारी, चिकनी तथा अभ्रक के समान पत्र वाली है। वह शुद्ध हरताल है, यह हरताल अधिक गुणों से युक्त अच्छी होती है। हरताल आठ तरह की होती है लेकिन सबसे अच्छी गोदन्ती हरताल होती है। हरताल को हर तरह के खून के रोगों में आंबा हल्दी के साथ, मिर्गी में शुद्ध बच्छनाग के साथ, जलोदर रोग में समुद्रफल के साथ तथा भगन्दर रोग में देवदाली के रस में देना चाहिए।
हरताल के उचित मात्रा में उपयोग से भगन्दर, उपदंश, विसर्पमण्डल (छोटी-छोटी फुंसियों का दल), कुष्ठ, पामा, चेचक, वातरक्त आदि रोग ठीक होते हैं। हरताल लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में खाना चाहिए और नमक, खटाई तथा मिर्च आदि को एकदम छोड़ देना चाहिए। हरताल श्वांस, खांसी और क्षय रोगों को दूर करती है तथा पित्त, वातरक्त, दमा, खुजली, फोड़ा और कोढ़ को दूर करती है।
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हरताल वानस्पतिक है, और जांगम। यह स्थावर द्रव्यों की श्रेणी में आता है। यानी एक खनिज द्रव्य है। हरताल दो तरह का होता है- स्वेत और पीत।स्वेत को गोदन्ती हरताल भी कहते हैं, और पीत को हल्दिया हरताल के नाम से जाना जाता है। यह अभ्रक की तरह चमकीला और किंचित परतदार होता है। अपेक्षाकृत वजनी भी होता है। इसमें संखिया (Arcenic) का अंश पाया जाता है,इस कारण जहरीला भी है। सामान्य अवस्था (बिना शोधन के) में इसका भक्षण जानलेवा है। आयुर्वेद के साथ-साथ तन्त्र में इसका विशेष प्रयोग है। यन्त्र लेखन में इसे स्याही की तरह उपयोग किया जाता है। कुछ विशिष्ट होम कार्यों में भी इसका उपयोग होता है। भगवती पीताम्बरा बगला की साधना में हल्दिया हरताल के बिना तो काम ही नहीं हो सकता। तात्पर्य यह कि इनकी साधना में अत्यावश्यक है। चन्दन के रुप में और होम में भी। अन्य विभिन्न अष्टगन्धों के निर्माण में हरताल का उपयोग किया जाता है।
जड़ी-वूटी विक्रेताओं के यहां आसानी से उपलब्ध है। वर्तमान में इसका बाजार भाव डेढ़-दो हजार रुपये प्रति किलोग्राम है। जल में आसानी से घुलनशील है। अतः चन्दन की तरह घिस कर उपयोग किया जा सकता है।
गुरुपुष्य योग में बाजार से खरीद कर इसे घर ले आयें, और गंगाजल से शुद्ध कर, पीले नवीन वस्त्र का आसन देकर पीतल की कटोरी में पीठिका पर रख कर, पंचोपचार पूजन करें। पूजनोपरान्त श्री शिवपंचाक्षर मंत्र का ग्यारह माला जप करने के बाद, प्रथम दिन ही ग्यारह माला पीताम्बरा मंत्र का भी जप करें। ध्यातव्य है कि शिवपचंचाक्षर मंत्र-जप रुद्राक्ष के माला पर, और पीताम्बरा मंत्र-जप हल्दी के माला पर करना चाहिए। आगे छत्तीश दिनों तक पूर्ण अनुष्ठानिक विधि से उक्त दोनों जप होना चाहिए, यानी लगभग ढाई घंटे नित्य का कार्यक्रम रहेगा। एक बार में स्वार्थवश "बहुत अधिक मात्रा पर" प्रयोग करें। सौ ग्राम की मात्रा पर्याप्त है- एक बार के प्रयोग के लिए।
भगवती बगला की उपासना में विभिन्न प्रयोग बतलाये गये हैं।सभी में इसका उपयोग किया जा सकता है। हल्दी के चूर्ण के साथ दशांश मात्रा में मिलाकर हवन करने से सभी प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि होती है।

इस प्रकार विधिवत साधित हल्दिया हरताल को मर्यादा पूर्वक काफी दिनों तक सुरक्षित रख कर प्रयोग में लाया जा सकता है। षटकर्म के सभी कार्य इससे बड़े ही सहज रुप में सिद्ध होते हैं। जल में थोड़ा घिसकर नित्य तिलक लगायें- इस साधित हरताल का। विश्वविमोहन का अमोघ अस्त्र है यह। किन्तु ध्यान रहे- साधना का दुरुपयोग हो, और व्यापार हो तान्त्रिक वस्तुओं का। दुरुपयोग का सीधा परिणाम है- गलितकुष्ट। दुरुपयोग से- साधित ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन अवरुद्ध होकर, अन्तः क्षरण का कार्य होने लगता है। परिणामतः रस-रक्तादि सप्तधातुओं से निर्मित शरीर के सभी धातुओं का हठात् क्षरण होने लगता है, और अन्त में गलित कुष्ट के रुप में लक्षित होता है।

फिटकिरी


फिटकिरी एक सुपरिचित स्थावर द्रव्य है, सुलभ और सस्ता भी।इसका शास्त्रीय नाम कांक्षी है। रक्त-रोधन, रक्त-शोधन, व्रण-रोपण आदि में इसका प्रचुर प्रयोग होता है। दाढ़ी बनाने के बाद फिटकिरी को पानी में डुबोकर चेहरे पर रगड़ने में नाई बड़ी फुर्ती दिखाता है- क्यों कि कटे भाग पर कुछ विशेष जलन पैदा करता है। आयुर्वेद और होमियोपैथी में इसके औषधीय प्रयोग से लोग अवगत हैं। यहां कुछ अन्य लोकोपयोगी प्रयोगों की चर्चा की जा रही है-
Ø किसी भी रविवार को फिटकिरी का बड़ा टुकड़ा (सवा किलो करीब-एक ही खण्ड) खरीद कर लायें, और जल से शुद्ध कर नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर पीठिका पर रख दें। फिर पंचोपचार पूजन करने के बाद सूर्य पंचाक्षर मंत्र से आरम्भ कर क्रमशः केतु पंचाक्षर मंत्र तक (ग्रहों के सही क्रम में) एक-एक हजार जप कर लें। जप के बाद सुविधानुसार कुछ संख्या में तिलादि साकल्य से होम भी अवश्य करें। इस प्रकार साधित कांक्षी को उसी लाल टकड़े में बांध कर वास्तुदोष प्रभावित क्षेत्र में लटका दें। हो सके तो वास्तुमण्डल के मध्य खण्ड में इस भांति लटकावें ताकि हवा के हल्के झोंके में भी दोलायमान हो। दोलन इसकी गुणवत्ता में वृद्धि करता है। थोड़े ही दिनों में आसपास के समस्त वास्तुदोषों को आत्मसात कर लेगा। तीन से छः माह बाद उसे सम्मान पूर्वक उतार कर वस्त्र सहित कहीं जाकर जल में विसर्जित कर दें, और घर आकर किसी योग्य वास्तुशास्त्री से वास्तुवन्धन करा लें। एक बार की यह क्रिया दस-बारह वर्षों तक कारगर रहेगी, वशर्ते कि भवन में कोई विशेष वास्तुदोष जाने-अनजाने पैदा न कर दिया जाय। जैसे कि, किसी ने ब्रह्म स्थान को ही छेड़ दिया, दूषित कर दिया, नैऋत्य में गड्ढा खोद दिया, ईशान में अग्नि स्थापित कर दिया- इस प्रकार सीधे पंचतत्वों को छेड़ दिया गया, वैसी स्थिति में आपका पूर्व बन्धन स्वयमेव शिथिल-खण्डित हो जायेगा।
Ø सामान्य रुप से साधित करके छोटे (सौ-दो सौ ग्राम) के टुकडें को भी घर के किसी भाग में रखने से आसपास के वास्तुदोषों का निवारण होता है।
Ø फिटकिरी को सीधे गरम तवे पर डाल दें। थोड़ी देर में पिघलने लगेगा, और कुछ देर छोड़ देने पर हल्के लावे की तरह हो जायेगा, मानों मकई का लावा हो। अब उसे उतार कर सहेज लें। यह क्रिया किसी सोमवार को स्नानादि शुद्धि के बाद करें। लावा तैयार हो जाने के बाद कांसे के कटोरे में रख कर पंचोपचार पूजन और कम से कम एक हजार श्री शिवपंचाक्षर मंत्र का जप कर लें। इस प्रकार साधित कांक्षी-भस्म की रत्तीभर (१२५ मि.ग्रा.) मात्रा नित्य प्रातः-सायं मधु के साथ, तीन महीने तक सेवन करने से स्त्रियों का प्रदररोग समूल नष्ट होता है।

Ø उक्त विधि से वनायी गयी कांक्षी भस्म को विभिन्न जीर्ण-ज्वरों में भी सेवन किया जा सकता है। साथ में गिलोय-सत्व मिलाकर सेवन करने से लाभ अधिक और शीघ्र होगा।

सिन्दूर

सिन्दूर किसी विशेष परिचय का मोहताज़ नहीं है- खास कर भारत जैसे देश में, जहां स्त्रियों के सुहागरज के रुप में मान्यता है इसे। सधवा और विधवा की निशानी है - उसके मांग का सिन्दूर। कुआंरी कन्यायें माँग तो नहीं भरती, पर कंठ में या भ्रूमध्य में लगाने से परहेज भी नहीं करती। आजकल तरह-तरह के रंगों में सिन्दूर मिलते हैं, और अनजाने में स्त्रियां उन्हें अंगीकार भी करती हैं- उसी मर्यादा पूर्वक; किन्तु यह जान लें कि असली सिन्दूर सिर्फ दो ही रंगों का हो सकता है- पीला और लाल। इसके सिवा और कोई रंग नहीं।
थोड़ा पीछे झांक कर अपनी संस्कृति को ढूढ़ने-देखने का प्रयास करें तो पायेंगे कि जिस सिन्दूर का व्यवहार करने का अधिकार पति द्वारा विवाह-मंडप में दिया जाता है, वह सिन्दूर सिर्फ पीले रंग का ही होता है (लाल भी नहीं), और वजन में भी अन्य सिन्दूर की अपेक्षा भारी होता है।
ज्ञातव्य है कि असली सिन्दूर का निर्माण हिंगुल (सिमरिख) नामक एक स्थावर पदार्थ से होता है, जिसका रंग पीला और चमकीला होता है। चमक का मुख्य कारण है- इसके अन्दर पारद की उपस्थिति। इसी सिसरिख से उर्ध्वपातन क्रिया द्वारा पारा (Mercury) निकलता है। पारद के पातन के बाद जो अवशेष रहता है, उसी से सिन्दूर बनता है। इसका महंगा होना भी स्वाभाविक ही है।
(Modern sindoor, mainly an orange-red pigment. Vermilion is the purified and powdered form of cinnabar, which is the chief form in which mercury sulfide naturally occurs. As with other compounds of mercury, sindoor is toxic and must be handled carefully.)
गुण-धर्म से सिन्दूर रक्तशोधक, रक्तरोधक, और व्रणरोपक है। आयुर्वेद के विभिन्न औषधियों में भी इसका प्रयोग होता है। कर्मकांड-पूजा-पाठ का विशिष्ट उपादान है सिन्दूर। सभी देवियों को सिन्दूर अर्पित किया जाता है। सिन्दूर के वगैर जैसे सुहागिन का श्रृंगार अधूरा है, उसी प्रकार देवी-पूजन भी अधूरा है। अपवाद स्वरुप, पुरुष देवताओं में हनुमानजी और गणेशजी की पूजा में भी सिन्दूर अत्यावश्यक है। गणेश जी का शिव द्वारा शिरोच्छेदन हुआ था, तब आतुर अवस्था में माता पार्वती सिन्दूर लेपन कर उन्हें रक्षित की थी। राम-दरवार में मुक्ता- माला को खंडित करने पर हँसी के पात्र बने हनुमान ने अपना वक्षस्थल चीर कर सभासदों को चकित कर दिया था- उर में राम-दरवार-दर्शन करा कर। तब सीता माता ने सिन्दूर-लेपन कर उन्हें रक्षित किया था। एक और पौराणिक प्रसंग में सीता के सिन्दूर लगाने के औचित्य और महत्व पर हनुमान द्वारा जिज्ञासा प्रकट की गयी। सीता के यह कहने पर कि "इससे स्वामी की आयु बढ़ती है", श्री हनुमान अपने सर्वांग में सिन्दूर पोत कर दरबार में पुनः हँसी के पात्र बने थे। उनका तर्क था कि सिर्फ शरीर के उर्ध्वांग में थोड़ी मात्रा में भरा गया सिन्दूर जब स्वामी की आयु में वृद्धि कर सकता है, तो क्यों न पूरे शरीर को सिन्दूर से भर लिया जाय।
बात कुछ और नहीं, ये कथानक सिर्फ सिन्दूर की गरिमा को दर्शाते हैं।
विवाह काल में वारात जब कन्या के द्वार पर पहुंचती है, उस समय मां-बेटी एकान्त कुलदेवी-कक्ष में बैठ कर गोबर के गौरी-गणेश पर निरन्तर पीला सिन्दूर चढ़ाती रहती हैं- जब तक कि मंडप से कन्या का बुलावा न आ जाय। भले ही आज इस अति महत्वपूर्ण क्रिया को लोग महत्वहीन करार देकर पालन करने में भूल कर रहे हों, किन्तु है, यह एक रहस्यमय तान्त्रिक क्रिया, जिसका सम्बन्ध सीधे अक्षुण्ण सुहाग से है।
सिन्दूर का तान्त्रिक महत्व अमोघ है।यहां कुछ विशिष्ट प्रयोगों की चर्चा की जा रही है-
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जी का जन्मोत्सव होता है। दक्षिणात्य मत से चैत्र पूर्णिमा की मान्यता है। किसी अन्य मत से अन्य मास-तिथि भी मान्य है। उक्त दोनों दिन हनुमान जी की आराधना का विशेष महत्त्व है। आठ अंगुल प्रमाण के पत्थर की सुन्दर मूर्ति खरीद कर घर लायें। सामान्य प्राणप्रतिष्ठा-विधान से उसे प्रतिष्ठित करें। यथोपलब्ध पंचोपचार/ षोडशोपचार पूजन सम्पन्न करें। नैवेद्य में अन्य सामाग्री हो न हो, भुना हुआ चना और गूड़ अत्यावश्यक है। अब,एक पीतल, कांसा,या तांबा के पात्र में शुद्ध घी और शुद्ध सिन्दूर का मधुनुमा लेप तैयार करें, और उस प्रतिष्ठित मूर्ति की आंखें छोड़कर, शेष सर्वांग में लेपन कर दें। तत्पश्चात् ऊँ हँ हनुमतये नमः का ग्यारह माला जप रुद्राक्ष के साधित माला पर कर लें।यह क्रिया इक्कीश दिनों तक नित्यक्रम से, नियत समय पर करते रहें। इक्कीशवें दिन अन्य प्रसाद के साथ शुद्ध घी में बना गूड़-आंटे का चूरमा (ठेकुआं) अर्पित करें। कम से कम एक माला से उक्त मंत्र पूर्वक तिलादि साकल्य-होम भी कर लें। इस क्रिया से हनुमान जी अति प्रसन्न होते हैं। समस्त मनोकामनाओं की सिद्धि होती है। उक्त क्रिया को अन्य शुभ मुहूर्त में भी प्रारम्भ किया जा सकता है।
प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी कहते हैं। अगहन महीने में उक्त तिथि से संकट निवारण के लिए गणपति की साधना प्रारम्भ की जा सकती है। सुविधानुसार कुछ पूर्व में सारी तैयारी कर लें- आठ अंगुल प्रमाण की गणेश की सफेद पत्थर की मूर्ति खरीद लें। सामान्य प्राणप्रतिष्ठा-विधान से उसे प्रतिष्ठित कर लें। यथोपलब्ध पंचोपचार/ षोडशोपचार पूजन सम्पन्न करें। नैवेद्य में अन्य सामग्रियों के साथ-साथ मोदक (लड्डु) अवश्य हो। उधर दूर्वा भी अनिवार्य ही है- गणेश-पूजन में- इसे न भूलें। अब, एक पीतल, कांसा,या तांबा के पात्र में शुद्ध घी और शुद्ध सिन्दूर का मधुनुमा लेप तैयार करें, और उस प्रतिष्ठित मूर्ति की आंखें छोड़कर, शेष सर्वांग में लेपन कर दें। तत्पश्चात् पूर्व साधित रुद्राक्ष के माला पर ऊँ गं गणपतये नमः मंत्र का ग्यारह माला जप करें। जप समाप्ति के बाद एक माला से उक्त मंत्रोच्चारण पूर्वक तिलादि साक्लय-होम भी अवश्य कर लें। इस क्रिया को पूरे वर्ष भर इसी विधि से करते रहें- महीने में सिर्फ एक दिन की विशेष क्रिया है, शेष दिनों में सामान्य पूजन और घृत मिश्रित सिन्दूर लेपन तथा एक माला जप भी करते रहें। यह संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत समस्त विघ्नों को समाप्त कर मनोकामना की पूर्ति करने में सक्षम है।
अक्षय सौभाग्य की कामना प्रत्येक स्त्री को होती है। अतः इस कामना से सभी सौभाग्यकांक्षी स्त्रियां इस तान्त्रिक प्रयोग को कर सकती हैं, खास कर उन स्त्रियों को तो अवश्य ही करना चाहिए, जिनकी कुण्डली में मंगल, शनि, राहु आदि का दोष हो, तथा पति स्थान दुर्बल हो। किसी भी कारण से पति पर आये संकट को दूर करने में भी यह क्रिया सक्षम है। क्रिया विधि- गाय के गोबर से अंगुली के आकार की दो मूर्तियां पीले नवीन कपड़े पर स्थापित करें, और उन्हें गौरी और गणेश के रुप में प्रतिष्ठित कर सामान्य पंचोपचार पूजन करें। पूजन के पश्चात् आम या पान के पत्ते से ऊँ महागौर्यै नमः, ऊँ श्री गणेशाय नमः का उच्चारण करते हुए एक सौ आठ बार पीला सिन्दूर अर्पित करें। संख्या पूरी हो जाने पर कपूर की आरती दिखावें, और अपनी मनोवांछा निवेदन करें। तत्पश्चात् अक्षत छिड़क कर विसर्जन कर दें। यह क्रिया नित्य की है, कम से कम वर्ष भर तक करें। सामान्य स्थिति में तो अगहन महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी से प्रारम्भ करनी चाहिए। विशेष संकट की घड़ी में सामान्य पंचांग शुद्धि देख कर कभी भी किया जा सकता है। क्रिया थोड़ा उबाऊ जैसा प्रतीत हो रहा है, किन्तु है अद्भुत और अमोघ। मुख्य रहस्य है- गोबर के गौरी-गणेश को नियमित सुहागरज अर्पित करना। किसी अन्य पदार्थ की मूर्ति पर यही क्रिया उतनी करगर नहीं होगी- इसका ध्यान रखें।

शुद्ध सिमरिख से बने पीले सिन्दूर को पीले नवीन वस्त्र का आसन देकर, पंचोपचार पूजन करके, उसके समक्ष देवी नवार्ण का कम से कम नौ हजार जप कर सिद्ध कर लें- सुविधानुसार किसी नवरात्र या अन्य शुभ मुहूर्त में, और सुरक्षित रख लें। इस मन्त्राभिषिक्त सिन्दूर की एक चुटकी पुनः अभीष्ट नाम और मंत्र का मानसिक उच्चारण करते हुए जिसे प्रदान किया जायेगा वह वशीभूत होगा, किन्तु ध्यान रहे- किसी बुरे उद्देश्य से यह प्रयोग कदापि न करें। इस प्रकार साधित सिन्दूर का स्वयं भी तिलक के रुप में उपयोग कर, द्रष्टा को वशीभूत किया जा सकता है।

बांदा

Vanda Orchid
Vanda tessellata or Vandaka (वन्दाका)
Species: Vanda roxburghii.
Common name: Checkered Vanda, Vanda Orchid

मनी प्लांट भी एक बांदा है

तंत्र में अकसर बांदा का जिक्र आता है और कहा जाता है की बांदा बेहद तीब्र प्रभावकारी वनस्पति होती है, जो शीघ्र प्रभावी होती है| इससे सभी प्रकार के षट्कर्म किये जाते हैं| सामान्य रूप से यह धन समृद्धि, लाभ, सौभाग्य, शांति, कलह निवारण, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है|
बांदा एक वनस्पति है, जो भूमि पर न उगकर किसी वृक्ष पर उगती है| इस प्रकार यह परजीवी पौधा है जो किसी अन्य पेड़ या पौधे पर उगकर उसी के तत्वों से अपना पोषण करता है| आम, जामुन, महुआ ,आदि के पेड़ों पर इसे सरलता से देखा जा सकता है| इसके पत्ते हरे, मोटे, कड़े, और आकर में कुछ लम्बे तथा गोलाई युक्त होते हैं| फूल बहुत सुन्दर, गुलाबी रंग के, लौंग के आकार में उत्पन्न होते हैं| ये फूल गुच्छों में होते हैं और इनके नीचे निमौली जैसा फल भी मिलता है |
माना जाता है की बांदा एक प्रकार का रोग सूचक पौधा है| यह स्वयं भी रोग और शोषक है| अतः जिस पेड़ पर उगता है उसकी वृद्धि रुक जाती है| एक प्रकार का क्षयकारी प्रभाव उस पेड़ को भीतर ही भीतर जर्जर करने लगता है| इसीलिए अकसर इसे काट दिया जाता है| या उस डाली को ही काट कर हटा दिया जाता है जिसपर यह निकली होती है| वैसे बाँदा किसी भी पेड़ पर उग सकता है|
तंत्र शास्त्र में वृक्ष भेद के अनुसार बांदा के प्रयोग और प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया गया है| हर पेड़ के बंदे का अलग-अलग प्रभाव होता है| किन्तु सभी पेड़ों का बाँदा सुलभ नहीं होता| कुछ पेड़ों का बाँदा तो "हीरा -नीलम" जैसा दुर्लभ होता है| अस्तु बाँदा एक तुच्छ, उपेक्षित और अनुपयोगी वनस्पति दिखने पर भी तंत्र शास्त्र की दृष्टि से अद्भुत प्रभावशाली होता है| कार्य अनुसार अभीष्ट बांदा प्राप्त करके उसका विधिवत प्रयोग किया जाए तो सचमुच लाभ होता है|
बांदा की प्राप्ति में मुहूर्त का बहुत बड़ा महत्व है, आवश्यकता अनुसार बांदा खोजकर उसे सम्बंधित मुहूर्त में पूर्व निमंत्रण के साथ निर्दिष्ट विधि से ले आयें और निर्दिष्ट विधि से प्रयोग करें| मुहूर्त निर्धारण में नक्षत्र का विशेष ध्यान रखा जाता है| प्रत्येक बाँदा के लिए अलग अलग नक्षत्र की उपयोगिता का निर्देश मिलता है| जो प्राचीन ऋषि-मुनियों के अनुसंधान-शोध-परीक्षण के अनुसार बनाये गए हैं| प्रत्येक पेड़ पर उगे बांदा की प्रयोग विधियां, उनकी प्रतिक्रया, प्रभावशालिता, मुहूर्त, प्राप्ति विधि भिन्न हो सकती है अतः विषय विशेषज्ञ तन्त्रचार्य के निर्देशन में यह उपयोग में लाइ जाती है|
आम, महुआ, जामुन, बेल, सिरस, पीपल, बरगद, कटहल, इमली, बेर, बड, अशोक, नीम, अनार, हरसिंगार, आदि के बांदा सामान्यतया प्राप्त होते हैं जिनकी विधियाँ और प्रभाव भिन्न होते हैं और आवश्यकता नुसार प्रयोग में लाये जाते हैं| किसी पीपल पर बरगद या नीम अथवा बरगद पर पीपल या नीम बहुतायत देखने को मिल जाते हैं, लोग इन्हें ही बाँदा समझ लेते हैं जबकि यह बाँदा नहीं है, बाँदा एक भिन्न जाती का पौधा ही होता है| विभिन्न बाँदा प्रयोग से अनुकूलता, शारीरिक सुरक्षा, श्रम-संघर्ष-युद्ध में विजय, शक्ति, साहस, धन-संमृद्धि प्राप्त होती है, आय के स्रोत उत्पन्न होते हैं, सफलता आरोग्य प्राप्त होता है, घर में आया हुआ दुर्भाग्य, दुष्ट ग्रहों का प्रभाव, नजर-टोना अभिशाप, अभिचार समाप्त होता है, शारीरिक शकतो बढ़ता है, बुढ़ापा रोकता है, इससे विरोधी-शत्रु को दुःख-दुर्भाग्य-पीड़ा भी दी जा सकती है (इसके लिए विशिष्ट पौधे का बाँदा प्रयोग होता है), बाँदा से दिव्या दृष्टि पाई जा सकती है, गर्भधारण कराया जा सकता है, आदि आदि इसके अनेकानेक प्रयोग है|
मनीप्लांट भी एक प्रकार बांदा है| 
तंत्र प्रयोगों में अनेक वनस्पतियों का भी उपयोग किया जाता है, बांदा भी उन्हीं में से एक है। बांदा एक प्रकार का पौधा होता है जो जमीन पर न उगकर किसी वृक्ष पर उगता है। इस प्रकार यह एक परोपजीवी पौधा है जो किसी अन्य पेड़-पौधे पर उगकर उसी के तत्वों से पोषित होता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार प्रत्येक पेड़ पर उगा बांधा एक विशेष फल देता है। जानते हैं किस पेड़ का बांदा किस कार्य के लिए उपयोगी होता है-
1- बेर का बांदा- बेर के बांदे को विधिवत तोड़ कर लाने के पश्चात देव प्रतिमा की तरह इसको स्नान करवाएं व पूजा करें। इसके बाद इसे लाल कपड़े में बांधकर धारण कर लें। इस प्रकार आप जो भी इससे मांगेंगे वह सब आपको प्राप्त होगा।
2- बरगद का बांदा- यह बांदा बाजू में बांधने से हर कार्य में सफलता मिलती है और कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता।
3- हरसिंगार का बांदा- यह बांदा काफी मुश्किल से मिलता है। यदि हरसिंगार के बांदे को पूजा करने के बाद लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखें तो आपको कभी धन की कमी नहीं होगी।
4- अनार का बांदा- इस बांदे को पूजा करने के बाद घर में रखने से किसी की बुरी नजर नहीं लगती और न ही भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश होता है।
5- आंवले का बांदा- आंवले का बांदा भुजा में बांधने से चोर, डाकू, हिंसक पशु का भय नहीं रहता।
6- नीम का बांदा- नीम के बांदे को अपने दुश्मन से स्पर्श करा दें तो उसके बुरे दिन शुरु हो जाते हैं।
7- आम का बांदा- इस पेड़ के बांदे को भुजा पर धारण करने से कभी भी आपकी हार नहीं होती और विजय प्राप्त होती है।

Vanda tessellata or Vandaka (वन्दाका)

Vanda Orchid
Species: Vanda roxburghii.
Common name: Checkered Vanda, Vanda Orchid
• Bengali: rasna
• Hindi: वांदा Vanda, Nai, perasara
• Kannada: bandanike, badanika, jkeevanthige
• Marathi: aasna
• Oriya: ilkum
• Sanskrit: atirasa, bhujangakshi, chhatraki, dronagandhika
• Tamil: kantanakuli
• Telugu: chittiveduri, kanapabandanika
• Urdu: Banda
Botanical name: Vanda tessellata
Family: Orchidaceae (Orchid family)
Synonyms: Epidendrum tessellatum, Vanda roxburghii, Cymbidium tessellatum

Checkered Vanda is a medium to large sized, warm growing epiphytic orchid, with a climbing stem. Leaves are linear, narrow, 3-toothed at the tip.
The plant blooms on a sub-erect, 15-50 cm long inflorescence carrying 5 to 12, fragrant, long-lived flowers. Flowers are 4-5 cm across. The sepals and petals have undulating margins and are pale green, yellowish green or somewhat bluish with checkered lines of olive-brown on the inner surface. The outer surface is white, while the lip is violet-purple with a white margin, and usually deeper purple towards the tip.
It is used in the Malayasian Penninsula as a cure-all by drinking the juice from the compressed plant.
Checkered Vanda is found in the Chinese Himalayas, Assam India, Bangladesh, Himalayas, India, Sri Lanka and Myanamar at elevations of 1500 m.
The name "Vanda" is derived from the Sanskrit (वन्दाका) name for the species Vanda roxburghii.
Vanda tessellata is a species of orchid occurring from the Indian subcontinent to Indochina. It is a medicinal plant.

Description
It is an epiphytic perennial, stem 30-60 cm long, stout, scandent by the stout, simple or branching aerial roots. Leaves succulent, 15-20 cm, long, linear, recurved, complicate. Flowers in 6-10 flowered racemes, reaching with the peduncle 15-25 cm long. Sepals yellow, tessellated with brown lines and with white margins. Petals yellow with brown lines and white margins, shorter than the sepals. Lip 16 mm long, bluish, dotted with purple. Capsules 7.5-9 cm long, narrowly clavate-oblong with acute ribs.

Medicinal uses
The roots are alexiteric and antipyretic; useful in dyspepsia, bronchitis, inflammations, piles and hiccup. Externally the root is used in rheumatism and allied disorders and diseases of the nervous system. It is also employed as a remedy for secondary syphilis and scorpion stings. The juice of the leaves is used topically in otitis and a paste of them finds use as a febrifuge. The roots possess significant anti-inflammatory activity. and exhibit potent analgesic effects combined with a relatively low toxicity A novel aphrodisiac compound ( 2,7,7-tri methyl bicyclo [2.2.1] heptane) has been found in the orchid in 2013.

Chemical composition
The plant has an alkaloid, a glucoside, tannins, β-sitosterol, γ-sitosterol and a long chain aliphatic compound, fatty oils, resins and colouring matters. Roots contain tetracosyl ferrulate and β-sitosterol-D-glucoside.

Traditional practices
In the Unani system, the root is used as a tonic for the liver and brain; effective against bronchitis, piles, lumbago, toothache, and boils of the scalp; it also is said to lessen inflammation and heal fractures. The root is said to be fragrant, bitter and useful in rheumatism and allied disorders, in which it is prescribed in a variety of forms. It is also used in the composition of several medicated oils for external application in rheumatism and diseases of the nervous system. In Chota Nagpur, the leaves are pounded into a paste and then applied to the body during fever. A compound decoction of this root is administered in cases of Hemiplegia (paralysis of one side of the body) as some Indian physicians consider it useful in rheumatism and all nervous diseases. The leaves are pounded and the paste is applied to the body to bring down fever; the juice is dropped in the ear for the treatment of Otitis media and other inflammatory conditions. The roots are used in Dyspepsia, Bronchitis, Rheumatism, and also in fever; they are reported to possess antibacterial and anti-tubercular properties. The herb is also used for Sciatica. The leaves are used by the Santhal girls for making anklets.

Use as an Entheogen in India

'Ayurvedic shamans' in India are said to have used the plant to induce 'the hypnotic narcosis of their office' leading to 'a transcendent state of being', having learnt originally of the intoxicating properties of this orchid by observing bees which had fed upon its nectar falling to the ground in a state of stupefaction. Evidence for the practice is sparse, but, given the presence of alkaloids in V.tessellata and its well-documented employment in diseases of the nervous system,such use is intrinsically plausible. In similar vein, Tantric magicians are said to have ingested the fleshy roots of this species as an aid to divination, along with the tubers of another orchid, Dendrobium macraei (synonyms Ephemerantha macraei and Flickingeria macraei, but see page Flickingeria re. unaccepted genus name still used in the horticulture trade).

अष्टगंध

कर्मकांड एवं यन्त्र लेखन में अष्टगंध का प्रयोग होता है। 
अष्टगंध क्या है और कितने प्रकार की होती है। शास्त्रों में तीन प्रकार की अष्टगन्ध का वर्णन है, जोकि इस प्रकार है- 
शारदा तिलक के अनुसार अधोलिखति आठ पदार्थों को अष्टगन्ध के रूप में लिया जाता है-चन्दन, अगर, कर्पूर, तमाल, जल, कंकुम, कुशीत, कुष्ठ। यह अष्टगन्ध शैव सम्प्रदाय वालों को ही प्रिय होती है।
दूसरे प्रकार की अष्टगन्ध में अधोलिखित आठ पदार्थ होते हैं-कुंकुम, अगर, कस्तुरी, चन्द्रभाग, त्रिपुरा, गोरोचन, तमाल, जल आदि। यह अष्टगन्ध शाक्त व शैव दोनों सम्प्रदाय वालों को प्रिय है।
वैष्णव अष्टगन्ध के रूप में इन आठ पदार्थ को प्रिय मानते है-चन्दन, अगर, ह्रीवेर, कुष्ठ, कुंकुम, सेव्यका, जटामांसी, मुर। अन्य मत से अष्टगन्ध के रूप में निम्न आठ पदार्थों को भी मानते हैं-अगर, तगर, केशर, गौरोचन, कस्तूरी, कुंकुम, लालचन्दन, सफेद चन्दन।

आठ सुगन्धित द्रव्य जिनको मिलाकर देवपूजन यन्त्रलेखन आदि के लिये सुगन्धित चन्दन तैयार किया जाता है, विभिन्न देवताओं के लिये इसमे कुछ वस्तुयें अलग अलग होती है, साधारणत: इसमे चन्दन, अगर देवदारु केसर कपूर शैलज जटामासी और गोरोचन माने जाते हैं।
ये पदार्थ भली-भांति पिसे हुए, कपड़छान किए हुए, अग्नि द्वारा भस्म बनाए हुए और जल के साथ मिलाकर अच्छी तरह घुटे हुए होने चाहिएं।