Monday, June 27, 2016

सहदेवी / Sahadevi


सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है। अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख्य कोई बड़ी बात नहीं है परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा। विभिन्न तंत्र शास्त्र और यहाँ तक की अथर्ववेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। आशा है इससे आप इसकी महत्ता समझेंगे।
किसी रवि-पुष्य योग के दिन प्रात: सूर्योदय पूर्व शास्त्रीय विधि पूर्वक एक दिन पूर्व संध्याकाल में निमंत्रण देकर प्राप्त कर लें फिर घर लें आये और पंचामृत से स्नान कराकर उसकी विधिवत षोडशोपचार पूजा करें।
पूजन मन्त्र इस प्रकार है "ॐ नमो भगवती सहदेवी सदबलदायिनी सर्वंजयी कुरु कुरु स्वाहा।" तंत्र-सिद्धि में सहदेवी का पोधा विभिन कार्यो मे प्रयुक्त होता है l यदि कोई विशेष प्रयोजन न हो तो उपरोक्त विधि से पूजित पौधे के स्वरस में शुद्ध केसर और शुद्ध गोरोचन मिलाकर गोली बना कर सुरक्षित रख लें। जब कभी आवश्यकता हो गंगाजल में घिस कर उसका तिलक करें। ये चमत्कारी प्रभाव और सर्वत्र विजय देने वाला जगत मोहन प्रयोग है।
1. शांति, धन-धान्य-व्यापार वृद्धि के लिए:-
A. विधिवत सिद्ध की हुई जड़ को लाल वस्त्र में लपेट कर तिजोरी मे रखने से अभीष्ट धन-वृद्धि होती है l
B. रसोई अनाज भंडार में शुद्ध स्थल पर स्थापित करने से अन्न परिपूर्ण रहता है।
C. घर के मंदिर में स्थापित कर नित्य प्रणाम करने से घर में शांति रहती है।
2. विवाद विजय यदि किसी प्रकार के विवाद में फंस जाएँ और निर्णय के लिए जाना हो तो इसकी विधिवत सिद्ध की हुई जड़ को धारण करने पर निश्चित ही विजय प्राप्त होती है।
3. प्रभाव-वृद्धि:- पंचाग का चुर्ण तिलक की भाति मस्तक और जिह्वा पर लगा कर कही जाए तो दर्शको पर विशेष प्रभाव पड़ता हैl सब लोग इसको सम्मान की दृष्टी से देखते और सुनते है l
4. मोहन प्रयोग `:-
A. इस पौधे की जड़ का अंजन लगाने से दृष्टी मे मोहक-प्रभाव उत्पन्न होता हैl
B. तुलसी-बीजचूर्ण तु सहदेव्य रसेन सह।
रवौ यस्तिलकं कुर्यान्मोहयेत् सकलं जगत्।।
तुलसी के बीज के चूर्ण को सहदेवी के रस में पीस कर तिलक के रूप में उसे ललाट पर लगाएं। उससे उसको देखने वाले मोहित हो जाते हैं।
C. अपामार्गों भृङ्गराजो लाजा च सहदेविका।
एभिस्तु तिलकं कृत्वा त्रैलोक्यं मोहयेन्नरः।।
अपामार्ग-ओंगा, भांगरा, लाजा, धान की खोल और सहदेवी इनको पीस कर उसका तिलक करने से व्यक्ति तीनों लोकों को मोहित कर लेता है।
मन्त्र - इन प्रयोगों की सिद्धि के लिए अग्रिम दिए हुए मंत्रों के दस हजार जप करने से लाभ होता है।
”ॐ नमो भगवते रुद्राय सर्वजगन्मोहनं कुरु कुरु स्वाहा।“ अथवा
”ॐ नमो भगवते कामदेवाय यस्य यस्य दृश्यो भवामि यश्य यश्य मम मुखं पश्यति तं तं मोहयतु स्वाहा।"
5. वशीकरण प्रयोग:
A. गृहीत्वा सहदेवीं च छायाशुष्कां च कारयेत्।
ताम्बूलेन च तच्चूर्ण सर्वलोकवशंकरः।।
सहदेवी को छाया में सुखाकर उसका चूर्ण बना लें तथा उसे पान में डाल कर खिलाएं तो सभी का वशीकरण हो जाता है।
B. रोचना सहदेवीभ्यां तिलकं लोकवश्यकृत्।
गोरोचन और सहदेवी को मिलाकर उसका तिलक करने वाला सब को वश में कर लेता है।
वशीकरण मंत्र ”ॐ नमो नारायणाय सर्वलोकान् मम वशं कुरु कुरु स्वाहा।“
एकलक्ष जपान्मन्त्रः सिद्धो भवति नान्यथा।
अष्टोत्तरशतजपात् प्रयोगे सिद्धिरुत्तमा।।
एक लाख जप से यह मंत्र सिद्ध होता है और प्रयोग के समय इस मंत्र का 108 बार जप करके प्रयोग करने से सफलता मिलती है।
6. शत्रु स्तम्भन प्रयोग:
A. ‘‘ऊँ नमो दिगंबराय अमुकस्य स्तंभन कुरु कुरु स्वाहा।
अयुत जपात् मंत्रः सिद्धो भवति।
अष्टोत्तर शत जपात् प्रयोगः सिद्धो भवति।
उपर्युक्त मंत्र का दस हजार जप करने से मंत्र सिद्ध होता है और आवश्यकता होने पर एक सौ आठ बार जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है।
मंत्र – ‘अमुकस्य’ के स्थान पर जिसके आसन पर स्तंभन करना हो उसका नाम लेना चाहिए।
B. अपामार्ग और सहदेई को लोहे के पात्र में डालकर पींसें और उसका तिलक मस्तक पर लगाएं। अब जो भी देखेगा उसका स्तंभन हो जाएगा।
C. भांगरा, चिरचिटा, सरसों, सहदेई, कंकोल, वचा और श्वेत आक इन सबको समान मात्रा में लेकर कूटें और सत्व निकाल लें। फिर किसी लोहे के पात्र में रखकर तीन दिनों तक घोटें। अब जब भी उसका तिलक कर शत्रु के सम्मुख जाएंगे, तो उसकी बुद्धि कुंठित हो जाएगी।
7. अग्नि स्तम्भन सहदेवी, घृतकुमारी और आक के रस को मिलाकर लेपन करने से अग्नि स्तंभित होती है। उक्त मिश्रण को हाथ में लगाकर यदि अग्नि में भी हाथ डाल दें तो हाथ नहीं जलेगा। ऐसा तंत्र ग्रंथों में वर्णित है।
8. आयुर्वेद
a . इसकी जड़ को भुजा में बाँधने से विभिन्न व्याधियां और रोग स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
b. सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़े करके कमर में बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।
c. सहदेवी का पौधा नींद न आने वाले मरीजों के लिए सबसे अच्छा है. इसे सुखाकर तकिये के नीचे रखने से अच्छी नींद आती है
d. इसके नन्हे पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें. बहुत अच्छी नींद आएगी.
e. यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है. बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है. इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें. यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है.
f. अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें.
g. अगर आँतों में संक्रमण है, अल्सर है या फ़ूड poisoning हो गई है, तो 2 ग्राम सहदेवी और 2 ग्राम मुलेटी को मिलाकर लें
h. अगर मूत्र संबंधी कोई समस्या है तो एक ग्राम सहदेवी का काढ़ा लिया जा सकता है.
i. कंठमाला रोग में इसकी जड़ भुजा में बांधने से शीघ्र रोग मुक्ति होती है।
9. संतान-लाभ:-
a. यदि कोई स्त्री मासिक-धर्म से पांच दिन पूर्व तथा पांच दिन पष्चात तक गाये के घी मे सहदेवी का पंचाग सेवन करे तो अवश्य गर्भ सिथर होता है l
b. इसको दूध में पीस कर नस्य लेने से स्वस्थ संतान पैदा होती है।
10. प्रसव-वेदना निवारक:- इसकी जड़ तेल मे घिसकर जन्नेद्रिये पर लेप कर दें l अथवा स्त्री की कमर मे बांध दें, तो वह प्रसव-पीढा से मुक्त हो जाती हैं l
11. पथरी गुर्दे की पथरी में इसके स्वरस को 4-5 पत्ते तुलसी के रस और भूमि आंवला के रस के साथ नियमित रूप से एक सप्ताह लेने पर पथरी स्वयं टूट कर बाहर आ जाती है।

मित्रों, ये तो बस झलक मात्र है इसके अनेकों प्रयोग हैं जिन्हें एक लेख में समेट पाना सम्भव नहीं है। सबसे जरुरी ये है की आप इसके पौधे को पहचानते हों। यदि न मालूम हो तो किसी जड़ी बूटी के जानकार व्यक्ति या माली की मदद से खोज लें। क्यूंकि इससे मिलते जुलते दर्जनों पौधे हैं और गलत पौधे पर मेहनत करने का कोई लाभ नहीं होगा

Sunday, June 26, 2016

कुछ अनूठी वनस्पतियां


सोमवन्ती वनस्पतिः यह वनस्पति देव. भूमि हिमालय की गोद में वेदुन्ती नामक अप्सरा के श्राप से इस घोर कलियुग में सोमवन्ती नामक वनस्पति उत्पन्न हुई है।
इसका पौधा तीन फीट लंबा व इसके पत्ते मोटे होते हैं। पत्तों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है।
देखने में मन मोह लेने वाली यह वनस्पति प्रकृति की प्यारी व स्वर्ग की दुलारी है।
इस वनस्पति के सोलह फूल आते हैं तथा बीज के चारों ओर एक दिव्य पदार्थ रहता है।
एक फूल में कम से कम 5 ग्राम तक यह पदार्थ निकलता है।
इससे वायवीय धूप बनता है जो कि तांत्रिक प्रयोगों में काम आता है।
यह धूप आक पत्तों पर रखने मात्र से अपने आप जलने लग जाता है।
इसे आग दिखाने की कोई जरूरत नहीं होती।
आज जो भी कार्य मानव को कहेंगे पूरा होगा।
यह केवल तन को सुखी रखने के लिए है।
यह कोई जादू या मंत्र नहीं है।
वस्तुतः यह धूप कई तंत्र प्रयोगों में काम आती है।
जल जगनी वनस्पति: ंयह वनस्पति पृथ्वी की गोद में लता की भांति जमीन पर पड़ी रहती है।
इसके पत्ते छोटे आकार के व देखने में अति सुंदर होते हैं।
पत्तों का रस निकालकर बोतल में भरकर रखें।
ध्यान रहे कि मात्र स्वरस ही होना चाहिए।
इस रस को आप बहती हुई नदी या तालाब में डालकर पानी पर खड़े हो सकते हैं तथा चल भी सकते हैं।
यह भी कोई मंत्र नहीं है।
आप कर सकते हैं।
यह वनस्पति पानी को बांधने की शक्ति रखती है।
इसे कटोरे में पानी बांध कर काट सकते हैं।
यह सब प्रकृति का ही चमत्कार है।
यह वनस्पति संभावती अप्सरा की देन है।
कई मानवीय असाध्य बीमारियों का इलाज इस वनस्पति के पास है।
पेट व गुदा संबंधी इलाज तत्काल होता है।
वन-कन्या-वनस्पति: हिमालय भूमि पर यह वनस्पति सौन्दर्य बिखेरे खड़ी है।
यह भयपुनिता नामक अप्सरा से ही वन-कन्या नामक वनस्पति बनी है।
इसके श्राप से हर वर्षा ऋतु में आद्र्रा नक्षत्र में स्वर्ग से बीज डाले जाते हैं।
फिर यह पौधा बड़ा होकर करीब दो मीटर लंबा पौधा बन जाता है।
इसके पत्ते पत्थर चट्टा जैसे होते हैं।
इस पौधे के समीप जाकर एक लाईन अपनी तर्जनी उंगली से खींचकर इस वनस्पति को नियमित रूप से प्रणाम करते रहे जिससे इस वनस्पति का प्रत्येक पत्ता आपको प्रणाम करता प्रतीत होगा तथा यह वनस्पति बात भी कर सकती है।

इसके पास बैठकर कोई भी साधना की जाय तो अवश्य ही सफलता मिलती है।

दुर्लभ वनस्पति परिचय


रत्नगर्भा भारतभूमि आदिकाल से ही दुर्लभ वनस्पतियों से परिपूर्ण रही है।
इन वनस्पतियों का व्यापक प्रभाव मनुष्य के शरीर पर पड़ता है।
समृद्धि एवं शक्ति संपन्न तथा अद्भुत और चमत्कारिक लाभ प्रदान करने वाली ऐसी कुछ उल्लेखनीय दिव्य वनस्पतियांे की जानकारी दी गई है।
हर सिंगार के बांदा: आकस्मिक लाभ के लिए हर सिंगार के बांदा का प्रयोग करते हैं। उक्त बांदा को प्राप्त कर संपूर्ण बांदा पर अष्टगंध लगा दें। फिर बांदा के ऊपर सिंदूर से स्वास्तिक का अंकन कर किसी चांदी के पात्र में ढक्कन बंद करके रखें। इसे अपनी दुकान तथा व्यापार स्थल अथवा घर पर धन स्थान या गल्ले में स्थापित कर लाभान्वित हो सकते हैं। गरुड़ का बांदा: गरुड़ का बांदा दिव्य शक्ति संपन्न होता है। इस बांदा को सफेद गुंजा के इक्कीस दानों के साथ चांदी के डिब्बे में शहद के साथ डुबोकर रखें। यह बांदा कार्य सफलता में सहायक है। व्यापारियों के लिए यह प्रभावकारी माना जाता है।
औषध गुणों के कारण कल्पवृक्ष की पूजा की जाती है। भारत में रांची, अल्मोड़ा, काशी, नर्मदा किनारे, कर्नाटक आदि कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर ही यह वृक्ष पाया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार परिजात ही कल्पवृक्ष है। यह वृक्ष उत्तरप्रदेश के बाराबंकी के बोरोलिया में आज भी विद्यमान है। कार्बन डेटिंग से वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र 5,000 वर्ष से भी अधिक की बताई है।
समाचारों के अनुसार ग्वालियर के पास कोलारस में भी एक कल्पवृक्ष है जिसकी आयु 2,000 वर्ष से अधिक की बताई जाती है। ऐसा ही एक वृक्ष राजस्थान में अजमेर के पास मांगलियावास में है और दूसरा पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के आश्रम में मौजूद है।
यह एक परोपकारी मेडिस्नल-प्लांट है अर्थात दवा देने वाला वृक्ष है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन 'सी' होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं।
इसकी पत्ती को धो-धाकर सूखी या पानी में उबालकर खाया जा सकता है। पेड़ की छाल, फल और फूल का उपयोग औषधि तैयार करने के लिए किया जाता है।
पत्तों का उपयोग : हमारे दैनिक आहार में प्रतिदिन कल्पवृक्ष के पत्ते मिलाएं 20 प्रतिशत और सब्जी (पालक या मैथी) रखें 80 प्रतिशत। आप इसका इस्तेमाल धनिए या सलाद की तरह भी कर सकते हैं। इसके 5 से 10 पत्तों को मैश करके परांठे में भरा जा सकता है।
फल का उपयोग : कल्पवृक्ष का फल आम, नारियल और बिल्ला का जोड़ है अर्थात यह कच्चा रहने पर आम और बिल्व तथा पकने पर नारियल जैसा दिखाई देता है लेकिन यह पूर्णत: जब सूख जाता है तो सूखे खजूर जैसा नजर आता है।
कल्प फल: कल्प वृक्ष को सुख, समृद्धि, संपन्नता एवं स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है।
कल्पवृक्ष से प्राप्त फल को कल्प फल कहते हैं।
इस वृक्ष में नर एवं मादा श्रेणी के दो वृक्ष होते हैं। मादा वृक्ष में 12 वर्षों में एक बार फल लगता है।
कल्प फल को प्राप्त कर उस पर अष्टगंध एवं कामिंया सिंदूर का लेप करके मौली (कलावा) लगाकर किसी चांदी के पात्र में रखकर धन स्थान/व्यापार स्थल पर गल्ले/तिजोरी/कैश बाक्स में स्थापित कर धूप-दीप से इस फल की पूजा करनी चाहिए।
इंद्रजाल: यह एक वनस्पति है जो जंगलों में पायी जाती है।
इसका आकार शिराओं की भांति लहरदार लकीरों के रूप में होता है।
शिराओं के मध्य समस्त स्थान खाली रहता है।
इसको अपने पास रखने से नजरदोष, ऊपरी बाधा आदि का प्रभाव क्षीण होता है।
यह प्रबल आकर्षण शक्ति संपन्न है।
रवि पुष्य नक्षत्र, नवरात्र, दीपावली इत्यादि शुभ समय मंे मंत्रों से इंद्रजाल वनस्पति की शक्ति को मंत्रों से अभिमंत्रित कर साधक अपने कर्मक्षेत्र में अध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
वैजयन्ती: इसका वृक्ष परम सौभाग्य कारक होता है।
इसकी माला धारण करने से ग्रह दोषों की निवृत्ति होती है तथा मानसिक शांति मिलती है।
इसकी माला साधना-सिद्धि में प्रभावकारी है।
वैजयन्ती माला को पुष्य नक्षत्र में धारण करना शुभदायक है।
कमलगट्टा: कमलगट्टे के बीजों में लक्ष्मी जी का वास माना जाता है।
वहीं इन बीजों में शत्रु कष्टों से रक्षा की शक्ति भी निहित है। लक्ष्मी जी के मंत्रों एवं धनदायक मंत्रों के जप कमलगट्टे की माला से करते हैं।
शत्रुजन्य कष्टों से बचाव हेतु मंत्र जप भी कमल गट्टे की माला से किया जाता है।
लक्ष्मीजी के लिए मंत्रोच्चार द्वारा किये जाने वाले हवन में कमलगट्टे के बीजों से आहुति दी जाती है।
श्रीफल (नारियल): यह शकुन व शुभ का प्रतीक है।
इसे श्रीफल भी कहते हैं यह आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर है।
इसके वृक्ष को घर की चहारदीवारी में लगाना शुभत्व प्रदान करता है।
कोई भी धार्मिक अनुष्ठान अथवा शुभकार्य बिना नारियल के पूर्ण नहीं हो सकता।
लघु नारियल का प्रयोग अर्थलाभ, व्यापार में ऋद्धि-सिद्धि हेतु किया जाता है।
एकाक्षी नारियल: एकाक्षी नारियल दुर्लभ परंतु प्रभावशाली माना गया है।
इसे किसी शुभ मुहूर्त में प्राप्त करके चैकी पर कपड़े के ऊपर रखकर सिंदूर मिश्रित देशी घी का लेप, धूप-दीप, पुष्प, चंदन इत्यादि समर्पित करें।
इसकी विधि-विधान से प्रतिष्ठा करने व मंत्रों द्वारा पूजा करने से सौभाग्य जागृत हो जाता है।
दरियाई नारियल: दरियाई नारियल धनात्मक ऊर्जा संपन्न माना जाता है।
यह शक्तिदायक होता है।
इसको घर एवं व्यापार-स्थल पर विधि-विधान से रखने से नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है एवं कार्य व्यापार बाधा शमन के उपयोग में भी आता है।
निर्गुण्डी: बिक्री बढ़ाने एवं धन-धान्य वृद्धि हेतु निर्गुण्डी को उपयोग में लिया जाता है।
निर्गुण्डी के पौधे को रविपुष्य नक्षत्र के शुभ मुहूर्त में प्राप्त करके पीली सरसों के साथ रखकर पोटली बना लें।
इस पोटली को व्यवसाय-स्थल अथवा घर में धन-स्थान पर स्थापित करना चाहिए। लघु नारियल: लघु नारियल का प्रयोग अर्थलाभ, व्यापार सिद्धि-ऋद्धि हेतु किया जाता है।
हत्था जोड़ी: अभिमंत्रित असली हाथा जोड़ी को कामियां सिंदूर, लौंग, कपूर सहित अपने पास रखने से धन व प्रभुता के साथ-साथ निर्भयता में वृद्धि होती है।
तुलसी: इसकी माला तैयार करके गले में धारण करते हैं।
तुलसी में नकारात्मक ऊर्जा को शमन करने की शक्ति होती है।
इसीलिए इसे बुरी नजर से उत्पन्न नजर दोषों से बचाव के लिए उपयोग में लाते हैं।
तुलसी में एक उड़नशील तेल होता है जो आस पास के वायु मंडल अथवा वातावरण में व्याप्त हो जाता है जिसमें नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करने की क्षमता होती है।
नजर बट्टु: नजर बट्टु एक वनस्पतिक फल होता हे।
छोटे-छोटे बच्चों को बार-बार नजर के प्रकोप से बचाने के लिए नजर बट्टू का उपयोग लाभप्रद रहता है।
भौरमणि: यह वनस्पति पुरी (उड़ीसा) के क्षेत्रों में पाई जाती है।
यह बुरी नजर वालों का मुंह काला करती है तथा व्यक्ति की रक्षा करती हैं।
भौरमणि के मनकों की माला को गले में धारण करते हैं।
इसे बुरी नजर के अनिष्ट प्रभावों से रक्षा हेतु तथा डर व भय से बचाव हेतु एवं नकारात्मक भावना विचार एवं शक्तियों से रक्षा के लिए पहना जाता है।
भौरमणि की माला से व्यक्ति में सात्विक गुणों का आविर्भाव होता है।

मानसिक शुद्धि एवं आध्यात्मिक शक्ति के विकास का मार्ग प्रशस्त होता हे तथा बुरे विचारों का शमन होता है।

श्रृगालश्रृंगी

जांगम द्रव्यों में श्रृगालश्रृंगी एक अद्भुत और अलभ्य पदार्थ है। सियार के सभी पर्यायवाची शब्दों- जम्बुक, गीदड़ आदि से जोड़कर इसके भी पर्याय प्रचलित हैं; किन्तु सियारसिंगी सर्वाधिक प्रचलित नाम है। आमलोग तो इसके होने पर ही संदेह व्यक्त करते हैं- कुत्ते-सियार के भी कहीं सींग होते हैं? किन्तु तन्त्र शास्त्र का सामान्य ज्ञान रखने वाला भी जानता है कि सियारसिंगी कितना महत्त्वपूर्ण तान्त्रिक वस्तु है। शहरी सभ्यता और पश्चिमीकरण ने नयी पीढ़ी के लिए बहुत सी चीजें अलभ्य बना दी हैं। बहुत सी जानकारियां अब मात्र किताबों तक ही सिमट कर रह गयी हैं, अपना अनुभव और प्रत्यक्ष ज्ञान अति संकीर्ण हो गया है। चांद और मंगल की बातें भले कर लें, जमीनी अनुभव के लिए भी "विकीपीडिया" तलाशना पड़ता है।
बहुत लोगों ने तो सियार देखा भी नहीं होगा। चिड़ियाघर में शेर की तरह इन बेचारों को स्थान भी शायद ही मिला हो, फिर शहरी बच्चे देखें तो कहां? सियार काफी हद तक कुत्ते से मिलता-जुलता प्राणी है, किन्तु कुत्ते से स्वभाव में काफी भिन्न।एक कुत्ता दूसरे कुत्ते को देखकर गुरगुरायेगा, क्यों कि उसमें थोड़ी वादशाहियत है, शेखी है। कुत्ता बहुत समूह में रहना पसन्द नहीं करता, जब कि सियार बिना समूह के रह ही नहीं सकता। उसकी पूरी जीवन-चर्या ही सामूहिक है। देहात से जुड़े लोगों को सियार का समूहगान सुनने का अवसर अवश्य मिला होगा। वन्य-झाड़ियों में माँद (छोटा खोहनुमा) बनाकर ये रहते हैं। दिन में प्रायः छिपे रहते हैं, और शाम होते ही बाहर निकल कर "हुआ...हुआ" का कर्कस कोलाहल शुरु कर देते हैं। सियारों के इस समूह में ही एक विशेष प्रकार का नर सियार होता जो सामान्य सियारों से थोड़ा हट्ठा-कट्ठा होता है। अपने समूह में इसकी पहचान मुखिया की तरह होती है, आहार-विहार-व्यवहार भी वैसा ही। फलतः डील-डौल में विशिष्ट होना स्वाभाविक है। अन्य सियारों की तुलना में यह थोड़ा आलसी भी होता है- बैठे भोजन मिल जाय तो आलसी होने में आश्चर्य ही क्या?खास कर रात्रि के प्रथम प्रहर में यह अपने माँद से निकलता है। विशेष रुप से कर्कस संकेत-ध्वनि करता है, जिसे सुनते ही आसपास के मांदों में छिपे अन्य सियार भी बाहर आ जाते हैं, और थोड़ी देर तक सामूहिक गान करते हैं- वस्तुतः भोजन की तलाश में निकलने की उनकी योजना, और आह्वानगीत है यह। सामूहिक गायन समाप्त होने के बाद सभी सियार अपने-अपने गन्तव्य पर दो-चार की टोली में निकल पड़ते हैं, किन्तु यह महन्थ (मुखिया) यथास्थान पूर्ववत हुँकार भरते ही रह जाता है। यहां तक कि प्रायः मूर्छित होकर गिर पड़ता है।
इसी महन्थ के सिर पर (दोनों कानों के बीच) एक विशिष्ट जटा सी होती है, जिसे सियारसिंगी कहते हैं। गोल गांठ को ठीक से टटोलने पर उसमें एक छोटी कील जैसी नोक मिलेगी, जो असलियत की पहचान है। भेंड़-बकरे की नाभी भी कुछ-कुछ वैसी ही होती है, पर उसके अन्दर यह नोकदार भाग नहीं होता। जानकार शिकारी वैसे समय में घात लगाये बैठे रहते हैं- पास के झुरमुटों में कि कब वह मूर्छित हो। जैसे ही मौका मिलता है, झटके से उसकी जटा उखाड़ लेते हैं। चारों ओर से रोयें से घिरा गहरे भूरे (कुछ छींटेदार) रंग का,करीब एक ईंच व्यास का गोल गांठ – देखने में बड़ा ही सुन्दर लगता है। एक सींग का वजन करीब पच्चीस से पचास ग्राम तक हो सकता है। तान्त्रिक सामग्री बेचने वाले मनमाने कीमत में इसे बेचते हैं। वैसे पांच सौ रुपये तक भी असली सियारसिंगी मिल जाय तो लेने में कोई हर्ज नहीं। ध्यातव्य है कि ठगी के बाजार में सौ-पचास रुपये में भी नकली सियारसिंगी काफी मात्रा में मिल जायेगा। रोयें, रेशे, वजन, सब कुछ बिलकुल असली जैसा होगा, असली वाला दुर्गन्ध भी होगा, सुगन्ध भी। वस्तुतः सियार की चमड़ी में लपेट कर सुलेसन से गांठदार बनाया हुआ, मिट्टी-पत्थर भरा होगा। कस्तूरी और सियारसिंगी के नाम से आसानी से बाजार में बिक जाता है। सच्चाई ये है कि कस्तूरी तो और भी दुर्लभ वस्तु है, जो मूलतः, मृग की नाभि से प्राप्त होता है। अतः धोखे से सावधान।
असली सियारसिगीं जब कभी भी प्राप्त हो जाय, उसे सुरक्षित रख दें, और शारदीय नवरात्र की प्रतीक्षा करें। वैसे अन्य नवरात्रों में भी साधा जा सकता है। गंगाजल से सामान्य शोधन करने के पश्चात् नवीन पीले वस्त्र का आसन देकर यथोपलब्ध पंचोपचार/ षोडशोपचार पूजन करें।तत्पश्चात् श्रीशिवपंचाक्षर एवं देवी नवार्ण मन्त्रों का कम से कम एक-एक हजार जप कर लें। इतने से ही आपका सियारसिंगी प्रयोग-योग्य हो गया। प्रयोग के नाम पर तो "बहुत और व्यापक" शब्द लगा हुआ है, किन्तु गिनने पर कुछ खास मिलता नहीं। बस एक ही मूल प्रयोग की पुनरावृत्ति होती है। सियारसिंगी बहुत ही शक्ति और प्रभाव वाली वस्तु है। पूजन-साधन के बाद इसे एक डिबिया में (चांदी की हो तो अति उत्तम) सुरक्षित रख देना चाहिये। रखने का तरीका है कि डिबिया में पीला कपड़ा बिछा दे। उसमें सिन्दूर भर दें, और साधित सियारसिंगी को स्थापित करके, पुनः ऊपर से सिन्दूर भर दें। नित्य पंचोपचार पूजन किया करें। पूजन में सिन्दूर अवश्य रहे। इस प्रकार सियारसिगीं सदा जागृत रहेगा। जहां भी रहेगा, वास्तुदोष, ग्रहदोष आदि को स्वयमेव नष्ट करता रहेगा। किसी प्रकार की विघ्न-वाधाओं से सदा रक्षा करता रहेगा। सियारसिंगी के उस डिबिया से निकाल कर थोड़ा सा सिन्दुर अपेक्षित व्यक्ति को अपेक्षित उद्देश्य (तन्त्र के षटकर्म) से दे दिया जाय तो अचूक निशाने की तरह कार्य सिद्ध करेगा- यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। प्रयोग करते समय चुटकी में उस खास सिन्दूर को लेकर बस पांच बार पूर्व साधित दोनों मंत्रों का मानसिक उच्चारण भर कर लेना है- प्रयोग के उद्देश्य और प्रयुक्त के नामोच्चारण के साथ-साथ। किन्तु ध्यान रहे- इस दुर्निवार वस्तु का दुरुपयोग बिना सोचे समझे(नादानी और स्वार्थवश) न कर दे, अन्यथा एक ओर तो कार्य-सिद्धि नहीं होती और दूसरी ओर वह साधित सियारसिंगी सदा के निर्बीज (शक्तिहीन) हो जायेगी। शक्तिहीनता का पहचान है कि उसमें से अजीब सा दुर्गन्ध निकलने लगेगा-
सड़े मांस की तरह, जब कि पहले उस साधित सियारसिंगी में एक आकर्षक मदकारी-मोदकारी सुगन्ध निकला करता था- देवी-मन्दिरों के गर्भगृह जैसा सुगन्ध। अतः सावधान- स्वार्थ के वशीभूत न हों।

प्रसंगवश यहां एक बात और स्पष्ट कर दूं कि सियारसिंगी की साधना में जो सिन्दूर प्रयोग किया जाय वह असली सिन्दूर ही हो,क्यों कि आजकल कृत्रिम पदार्थों से तरह-तरह के सस्ते और महंगे सिन्दूर बनने लगे हैं,जो शोभा की दृष्टि से भले ही महत्वपूर्ण हों,किन्तु पूजा-साधना में उनका कोई महत्व नहीं है। नकली सिन्दूर के प्रयोग से साधना निष्फल होगी- इसमें जरा भी संदेह नहीं।

कस्तूरी


अष्टगन्ध में कस्तूरी सर्वाधिक मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। आयुर्वेद, कर्मकांड, और तन्त्र में इसका विशेष प्रयोग होता है, किन्तु सुलभ प्राप्य नहीं होने के कारण नकल का व्यापार भी व्यापक है। उपलब्धि-स्रोत के विचार से कस्तूरी तीन प्रकार का होता है-
1. मृगा कस्तूरी- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है- मृग के शरीर से प्राप्त होने वाला यह एक जांगम द्रव्य है। ध्यातव्य है कि यह सभी मृगों में नहीं पाया जाता, प्रत्युत एक विशेष जाति के मृगों में ही पाया जाता है। उन विशिष्ट मृगों में भी सभी में हो ही- यह आवश्यक नहीं। इस प्रकार, विशिष्ट में भी विशिष्ट की श्रेणी में है। मृग की नाभि में एक विशेष प्रकार का अन्तःस्राव क्रमशः एकत्र होने लगता है, जिसका सुगन्ध धीरे-धीरे बाहर भी प्रस्फुटित होने लगता है। यहां तक कि उस सुगन्ध की अनुभूति उस अभागे मृग को होती तो है, किन्तु उसे यह ज्ञात नहीं होता कि सुगन्ध का स्रोत क्या है। उसे वह कोई बाहरी सुगन्ध समझ कर, उसकी खोज में इधर-उधर अति व्यग्र होकर भटकता है, और, यहां तक कि व्यग्रता में दौड़ लगाते-लगाते मूर्छित होकर गिर पड़ता है। प्रायः उस अवस्था में उसकी मृत्यु भी हो जाती है। "कस्तूरी कुण्डली बसे, मृग ढूढे वन माहीं..." की उक्ति इस बात का उदाहरण है। मृत मृग की नाभि को काट कर उससे वह गांठ प्राप्त कर लिया जाता है। ऊपर के चर्म-कवच को काट कर भीतर भरे कस्तूरी (महीन रवादार पदार्थ) को निकाल लिया जाता है। धन-लोलुप शिकारी (वनजारे) सुगन्ध के आभास से मृगों का टोह लेते रहते हैं, और उन्हें मार कर नाभि निकाल लेते हैं। वैसे भी नाभि-ग्रन्थि के काट लेने पर किसी प्राणी का बचना असम्भव है। आजकल इन मृगों की प्रजाति लगभग नष्ट की स्थिति में है। भेड़-बकरे की नाभि को काटकर, उसमें कृत्रिम सुगन्धित पदार्थ भर कर धड़ल्ले से नकली कस्तूरी का व्यापार होता है। अनजाने लोग ठगी के शिकार होते हैं, और द्रव्य-शुद्धि के अभाव में साधित क्रिया फलदायी नहीं होने पर साधक के साथ-साथ तन्त्रशास्त्र की भी बदनामी होती है|
2. विडाल कस्तूरी- नाम से ही स्पष्ट है- कस्तूरी विडाल (बिल्ली) (Civet Cat) के शरीर से प्राप्त होने वाला एक जांगम द्रव्य। वस्तुतः नरविलाव (Civet Cat) के अण्डकोश में एकत्र एक विशेष प्रकार का अन्तःस्राव (शुक्रकीटों के पोषणार्थ निर्मित) घनीभूत होकर एक सुगन्धित पदार्थ का सृजन करता है, जो काफी हद तक मृगाकस्तूरी से गुण-धर्म-साम्य रखता है। यह प्रायः नरविडाल (Civet Cat) के अण्डकोश से प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार प्राप्ति का सबसे सुलभ और सस्ता स्रोत है। अरबी विद्वानों ने इसे ज़ुन्दवदस्तर नाम दिया है। हकीमी दवाइयों में इसका काफी उपयोग होता है। तन्त्र शास्त्र में जहां कहीं भी कस्तूरी की चर्चा है, मुख्य रूप से मृगाकस्तूरी ही प्रयुक्त होता है। पवित्र जांगम द्रव्यों में वही मर्यादित है सिर्फ, न कि विडाल कस्तूरी। वैसे तामसिक तन्त्र साधक इसका प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं, और लाभ भी होता है, किन्तु सात्विक साधकों के लिए यह सर्वदा वर्जित है।
3. लता कस्तूरी-
यह एक वानस्पतिक द्रव्य है, जिसे किंचित गुण-धर्म के कारण कस्तूरी की संज्ञा दी गयी है। वैसे नाम है लता कस्तूरी, किन्तु इसका पौधा, फूल,पत्तियां सबकुछ भिण्डी (रामतुरई) के समान होता है, बल्कि उससे भी थोड़ा बड़ा ही। फल की बनावट भी भिण्डी जैसी ही होती होती है, परन्तु विलकुल ठिगना ही रह जाता है- लम्बाई में विकास न होकर, सिर्फ मोटाई में विकास होता है, और फल लगने के दो-चार दिनों में ही पुष्ट (कड़ा) हो जाता है। पुष्ट होने से पहले यदि तोड़ लिया जाय तो ठीक भिण्डी की तरह ही सब्जी बनायी जा सकती है। वैसे सब्जी की तुलना में इसका भुजिया अधिक अच्छा होता है। प्रत्येक पौधे में फल की मात्रा भी भिण्डी की तुलना में काफी अधिक होता है। इसकी एक और विशेषता है कि यह बहुवर्षायु वनस्पति है। छोड़ देने पर काफी बड़ा (अमरुद, अनार जैसा) हो जाता है, और लागातार बारहों महीने फल देते रहता है। एक बात का ध्यान रखना पड़ता है कि हर वर्ष कार्तिक से फाल्गुन महीने के बीच सुविधानुसार यदि थोड़ी छंटाई कर दी जाय तो नये डंठल निकल कर पौधे का सम्यक् विकास होकर फल की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। खेती की दृष्टि से यदि रोपण करना हो तो हर तीसरे वर्ष नये बीज डाल देने चाहिए। मैंने अपनी गृहवाटिका में इसे लगाकर काफी उपयोग किया है। इसका फल बहुत ही पौष्टिक होता है। पौष्टिकता में जड़ों की भी अपनी विशेषता है। इसे सुखा कर चूर्ण बनाकर, एक-एक चम्मच प्रातः-सायं मधु के साथ सेवन करने से बल-वीर्य की वृद्धि होती है। पुष्ट-परिपक्व फलों से प्राप्त बीजों को चूर्ण कर कस्तूरी की तरह उपयोग किया जा सकता है, जो किंचित सुगन्ध युक्त होता है। गुण-धर्म में मृगाकस्तूरी जैसा तो नहीं,फिर भी काफी हद कर कारगर है।

आयुर्वेद में स्थिति के अनुसार उक्त तीनों प्रकार के कस्तूरी का उपयोग किया जाता है। कर्मकाण्ड और तन्त्र में मुख्य घटक के साथ-साथ "योगवाही" रुप में भी प्रयुक्त होता है। कस्तूरी में सम्मोहन और स्तम्भन शक्ति अद्भुत रुप में विद्यमान है, चाहे वह शरीर के वीर्य (शुक्र) का स्तम्भन हो या कि बाहरी (शत्रु,शस्त्रादि) स्तम्भन। यह एक विकट रुप से उत्तेजक द्रव्य भी है। शरीर में ऊष्मा के संतुलन में भी इसका महद् योगदान है। कस्तूरी अष्टगन्ध का एक प्रमुख घटक है। इसके बिना अष्टगन्ध की कल्पना ही व्यर्थ है। साधित कस्तूरी के तिलक प्रयोग से संकल्पानुसार षट्कर्मों की सम्यक् सिद्धि होती है। अन्य आवश्यक द्रव्य मिश्रित कर दिये जायें, फिर कहना ही क्या। सौभाग्य से असली कस्तूरी प्राप्त हो जाय तो सोने या चांदी की डिबिया में रख कर पंचोपचार पूजन करने के बाद श्री शिवपंचाक्षर, और देवी नवार्ण मन्त्रों का एक-एक हजार जप (दशांश होमादि सहित) सम्पन्न करके डिबिया को सुरक्षित रख लें। इसे लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रयोग की मात्रा बहुत ही कम होती है- सूई के नोक पर जितना आ सके- एक बार के उपयोग के लिए काफी है। जैसा कि ऊपर भी कह आये हैं- सात्विक साधक सिर्फ मृगाकस्तूरी का ही प्रयोग करें। अभाव में आठ गुणा बल (साधना) देकर लता कस्तूरी का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु विडालकस्तूरी (जुन्दवदस्तर) का प्रयोग कदापि न करें।

मयूर पंख या मयूरपिच्छ


मयूरपिच्छ यानी मोर का पंख- एक अति पवित्र जांगम द्रव्य है। भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे मोर-मुकुट से सभी अवगत हैं। मोर को राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा प्राप्त है। वास्तु नियमानुसार भी मोर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण पक्षी है। तोते की तरह इसे पालने की प्रथा तो नहीं है। पिंजरे में इसे कैद भी नहीं रखा जा सकता है। उन्मुक्तता और विस्तार ही इसका जीवन-दर्शन है। पिंजरे में कैद करते ही थोड़े ही दिनों में रूग्ण होकर प्राण त्याग कर देता है। फिर भी चिड़ियाघरों में बड़े पिंजरों में रखने की धृष्टता तो हम करते ही हैं। शौक और सुविधा हो तो मोर को पालें, किन्तु मुक्त रहने की सुविधा-सहित।
समय-समय पर मोर के पंख अन्य पक्षियों की तरह ही स्वतः झड़ते रहते हैं। इन्हें एकत्र कर तरह-तरह के उपयोगी सामान- पंखे,चंवर,मंजूषा आदि बनाये जाते हैं। मोर के पंख को भस्म बनाकर विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयोग किया जाता है। मोर के पंख को हमारे ऋषि-महर्षि लेखनी के रुप में प्रयोग करते थे। यहां वैसे ही कुछ विशिष्ट प्रयोगों की चर्चा की जा रही है।
पूजा सामग्री विक्रेताओं के यहां मयूरपिच्छ सुलभ प्राप्य है। रविपुष्य या गुरुपुष्य योग (भद्रादि रहित) का विचार कर, इसे आदर पूर्वक क्रय कर, घर ले आयें। उपयोग और प्रयोग के अनुसार बने-बनाये मोर-पंखे भी खरीद सकते हैं। घर लाकर गंगाजल से शुद्ध करके, पीले या नीले नवीन वस्त्र का आसन देकर छोटी चौकी/ पीठिका पर आसीन कर दें। पंचोपचार/ षोडशोपचार पूजनोपरान्त श्री कृष्ण पंचाक्षर या सिर्फ सप्तशती का तृतीय बीज का सहस्र जप, दशांश होमादि सहित सम्पन्न कर लें। साधित मयूरपिच्छ का पंखा (चंवर) एक साधक के लिए अद्भुत कल्याणकारी अस्त्र है। इसी प्रकार मोर के पंख को बीस-पचीस के गुच्छे में भी रखकर उक्त विधि से साध सकते हैं। दोनों के प्रयोग भिन्न-भिन्न हैं।
प्रयोग-
Ø साधित मोरपंख से बने चंवर से साधित मंत्रोच्चारण (मानसिक) पूर्वक झाड़ देने से समस्त ग्रह वाधायें शान्त हो जाती हैं। प्रेतादि विभिन्न वायव्य विघ्न भी शमित होते हैं।
Ø साधित मोरपंख जिस घर में समादर पूर्वक रहता है, वहां किसी प्रकार के वास्तु दोष, ग्रह दोष, वायव्य दोष प्रभावी नहीं होते।
Ø दोषग्रस्त वास्तु को वाधित (खंडित) करने,रक्षित करने आदि कार्यों में साधित मोरपंख का उपयोग किया जा सकता है। जैसे, मान लिया किसी के रसोई घर से सटे (एक ही दीवार) शौचालय है, और रसोईघर अपने सही स्थान (अग्निकोण) पर है, तो ऐसी स्थिति में मध्य दीवार पर पांच-सात की संख्या में साधित मोरपंख का प्रयोग कर लाभान्वित हुआ जा सकता है। ध्यातव्य है कि रसोईघर की दिशा सही होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि नैऋत्य कोण पर बने रसोईघर में भी मोरपंख स्थापित कर लाभ हो ही जायेगा।
Ø मकान के भीतर चारो कोनों (हो सके तो दसों दिशाओं) -पूरब, अग्नि कोण, दक्षिण, नैऋत्य कोण, नैऋत्य और पश्चिम के मध्य (पाताल खण्ड), पश्चिम, वायव्य कोण, उत्तर, ईशान कोण, ईशान और पूरब के मध्य (आकाश खण्ड)} में साधित मयूरपिच्छ को स्थापित करने से विभिन्न प्रकार के वास्तु दोषों का शमन हो जाता है। हां, पंख की स्थापना के बाद संक्षिप्त रीति से वास्तु होम अवश्य कर दें। इसके लिए किसी योग्य वास्तुशास्त्री से सहयोग लेना चाहिए।
Ø मयूरपिच्छ के कठोर भाग को लेखनी की तरह प्रयोग किया जा सकता है। सरस्वती की साधना में इसका बड़ा महत्त्व है। इस लेखनी से भोजपत्र पर यन्त्र लेखन से यन्त्र में अद्भुत गुण-वृद्धि होती है।
Ø मयूरपिच्छ के बीच एक स्वेत वर्णी मयूर-चांद होता है। एक पंख में यह चांद एक ही होता है। साधित सात पंखों में से इस भाग को कैंची से विलकुल वारीकी से काटें, ताकि अन्य वर्णों का समावेश न हो। फिर उस कटे अंश के अति महीन टुकड़े करें (जितना महीन हो सके), और थोड़े गीले गूड़ के साथ मिलाकर सात छोटी-छोटी गोलियां बना लें। गोलियों का आकार ऐसा हो कि बिना चबाये आसानी से निगला जा सके। गोलियां बन जाने पर कांसे की कटोरी में पीले वस्त्र का आसन देकर स्थापित कर, पंचोपचार पूजन करें। फिर वहीं बैठकर एक हजार मन्मथ (कामदेव) मंत्र का जप करें। यह सारा कार्य फाल्गुन पूर्णिमा (जिस रात होलिका दहन होता है) को करना सर्वाधिक लाभप्रद होगा। वैसे अन्य पूर्णिमा को भी किया जा सकता है, जिसमें भद्रा और अन्य अशुभ योगादि न हों। इस प्रकार पुनर्साधित "मयूरशिखाचन्द्रवटी" को रजोस्नान के बाद, पांचवें दिन से लागातार सात दिनों तक, प्रातः स्नान के बाद गोदुग्ध के अनुपान से (बिना चबाये,तोड़े) सेवन करे तो विभिन्न प्रकार के वन्ध्यत्व दोषों का निवारण होकर सन्तान सुख की प्राप्ति होती है।
Ø उक्त मयूरशिखाचन्द्र को जारित कर मधु के साथ थोड़ी मात्रा (सूई के नोक पर जितना आ सके) में कुछ दिनों तक सेवन कराने से समस्त वालारिष्ट का शमन होता है।
Ø उक्त प्रयोग को सामान्य स्थिति में भी बालकों के कल्याण (खास कर दन्तोद्भेद के समय की पीड़ा)के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
Ø बालकों के झाड़-फूंक में साधित मयूरपिच्छ विशेष कारगर है।

Ø जिन बालकों को बार-बार नजर-दोष प्रभावित करता है, उन्हें मयूरशिखाचन्द्र को ताबीज में भर कर गले में धारण कराने से चमत्कारी लाभ होता है।

साहीकंटक


साही एक जंतु का नाम है, जो बड़े विलाव जैसा होता है, किन्तु इसका मुंह (थुथने) कुत्ते की तरह होता है, और पैर विल्ली से भी कुछ ठिगने कद का- ठीक विलायती कुत्ते जैसा। साही सियारों की तरह मांद में रहना पसंद करता है, भले ही वह उसका खुद का बनाया हुआ न हो। देहातों में, जहां आसपास जंगली वातावरण की भी सुविधा है, ईंट के पुराने भट्ठों में या भवन के खण्डहरों में इसे देखा जा सकता है। मूलतः मांसाहारी होते हुए भी, शाकाहार इसे काफी पसन्द है; यही कारण है कि ककड़ी-खरबूजे आदि इसे बहुत भाते हैं। वनजारे इसका शिकार करना खूब पसन्द करते हैं। किन्तु प्राकृतिक संरचना इसकी ऐसी है कि डंडे के लाख चोट भी इसे जरा भी घायल नहीं कर सकते। इसके शरीर पर दो अंगुल से लेकर बित्ते भर तक के लम्बे, मोटे-पतले, कलमनुमा गोलाई वाले, काफी मजबूत असंख्य कांटे होते हैं, जो आपातकाल की स्थिति भांपते ही सीधे तन कर खड़े हो जाते हैं, और वार बचा लेते हैं। सामान्य स्थिति में ये सुप्त रोयें जैसे पड़े रहते हैं- ठीक वैसे ही जैसे भय या ठंढ की स्थिति में हमारे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और सामान्य अवस्था में शरीर पर चिपके से रहते हैं।
प्राचीन काल में, जब आज का फाउन्टेनपेन नहीं था, मोर के पंख, या फिर इस साही नामक पशु के कांटों का उपयोग लेखनी के रुप में होता था। मोटे-पतले, अलग-अलग लिखावट के लिए अलग-अलग आकार के कांटों का उपयोग किया जाता था। ये कांटे प्राकृतिक रुप से काले-सफेद, दोनों ओर से नोकदार हुआ करते हैं, जो देखने में बड़े सुन्दर लगते हैं।
यज्ञोपवीत-संस्कार में अब तो लोग भूलते जा रहे हैं, किन्तु वटुक के शिखा-क्षौर में शिखाक्षेत्र को पांच खण्डों में विभाजित करने हेतु कुशा और साही-कंटक का अनिवार्य रुप से प्रयोग का विधान है। इसी साही-कंटक से खण्ड करते हुए, बीच में कुशा बांध दिया जाता है, जिसे तत्काल पिता/ गुरु द्वारा छिंदित किया जाता है।
साही के कांटे जड़ी-बूटी की दुकानों पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं- बहुत ही कम कीमत में। किसी भी नवरात्रि के पूर्व (आमावश्या की रात्रि या संध्या काल में) इसे क्रय कर घर ले आयें। गंगाजल से शुद्ध कर आदर पूर्वक नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर रख दें। अगले दिन से अन्य तान्त्रिक पदार्थों की तरह इसे पंचोपचार पूजन करें- पूरे नवरात्रि भर। साथ ही देवी-नवार्ण मंत्र का ग्यारह माला जप भी नित्य करते रहें। दिन में आपका जो भी नवरात्रि सम्बन्धी योजना हो करते रहें, कोई हर्ज नहीं। इस साही-कंटक-क्रिया को रात्रि में ही करें (निशीथ काल में) तो ज्यादा अच्छा है। एक साथ एक, तीन, पांच, सात, या नौ कांटों को साधित कर सकते हैं। नौ दिनों के पूजन और जप, होमादि से क्रिया सम्पन्न हो जायेगी। कांटा प्रयोग के योग्य हो जायेगा। आगे प्रयोग के समय पुनः कुछ मंत्रजप (प्रयोज्य नाम सहित) करना पड़ेगा।
साधित साही-कंटक-लेखनी से किसी भी षटकर्म-यन्त्र को लिखने से अद्भुत लाभ होता है।सामान्य लेखनी, अनार की लेखनी,मयूरपिच्छलेखनी आदि की तुलना में साही-कंटक-लेखनी का अपना अलग महत्त्व है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य है- विद्वेषण और उच्चाटन। इसमें इसे महारथ हासिल है। mपुराने लोग तो डर से साही का कांटा अपने घर में रखना भी नहीं चाहते थे, कि परिवार में लड़ाई-झगड़े होंगे। वैसे काफी हद तक यह सच भी है। सामान्य तया किसी को साही-कांटा अपने घर में रखने का सुझाव तो नहीं ही दूंगा- क्यों कि विद्वेषण इसका द्राव्यिक गुण है। साधित हो जाने पर तो कहना ही क्या। हां, साधकगण- जो विभिन्न तान्त्रिक वस्तुओं को सदा अपने पास रखा करते हैं, उनकी बात कुछ और है। अपनी साधना-बल से रक्षित रहते हैं।
पुनश्च, सावधान करना चाहूंगा कि कोई भी प्रयोग स्वार्थ और लोभ के वशीभूत होकर न करें। अन्यथा

भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। शास्त्र का सदुपयोग लोक कल्याण के लिए हो।